हमारे भारत का ये दुर्भाग्य था कि आजादी के बाद देश के तत्कालीन नेताओं ने भारत को भारत जैसा न बना के पश्चिमी देशों जैसे बनाने की कल्पना की,काफी प्रयास किये गए,यहाँ तक की हमारे भारत का संविधान भी एक नकल ही है,जिसमे अनेकानेक विसंगतियां आज भी विद्यमान हैं।जो कानून पश्चिमी देशों के लिए उपयोगी है ये आवश्यक नही कि भारत के लिए भी सही हो।संविधान के निर्माण हेतु विभिन्न देशों की यात्रा के साथ ही वहां के संविधान विशेषज्ञों से विचार-विमर्श की अपेक्षा अपने देश का भ्रमण एवं विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोगों से सलाह लेना उचित नही समझ गया।पश्चिमी देशों को क्या पता होगा भारत की अलग-अलग प्राकृतिक,सांस्कृतिक,भौगोलिक स्थितियों के बारे में,इन सबके बारे में भारत देश की मिट्टी में पैदा हुए,संस्कृति-परम्परा का निर्वहन करने वाले ही उचित व्याख्यान दे सकते हैं।एक ही नियम प्रत्येक देश अथवा स्थान पर लागू नही किये जा सकते।
संविधान निर्माताओं को भारत के विचार,संस्कार,संस्कृति को ध्यान में रखते हुए एक ऐसे संविधान का निर्माण करना चाहिये था जो इन सबका संरक्षण कर सके किन्तु इसके विपरीत संविधान निर्माण सभा मे पश्चिमी देशों के अधिकांश जन सम्मिलित हुए जिनकी दृष्टि में पश्चिमी सभ्यता ही उत्कृष्ट थी,उन्होंने अपनी उसी दृष्टि के फलस्वरूप भारतीय संविधान का मसौदा तैयार किया,जिसका परिणाम आज भी साक्षात दृश्य है।भारत देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी व्यथा प्रकट करते हुए ये कहा भी कि आज जो संविधान हमने अंगीकार किया है वो वास्तविक नही बल्कि पश्चिमी संविधान का एक नकल मात्र है,जिसमे कुछ भी नया नही।
इस संविधान के लागू होने के 3 वर्ष पश्चात ही डॉ. अम्बेडकर को ये अनुभूति होने लगी कि इस संविधान के कुछ पक्ष दोषपूर्ण है,किसी भी देश के संविधान से ही राष्ट्रीय अस्मिता का परिचय होता है।
भारतीय संविधान में भारतीयता का जो पुट स्थित होना चाहिए उसका आभाव साक्षात दृश्य होता है।
अंग्रेजों की वो चाल जो तत्कालीन नेता नही समझ सकें, हमारे देश के संविधान में हमारे लाखों वर्षों के गौरवशाली इतिहास को विस्मरण कराने के उद्देश्य से भारत को इंडिया लिखकर दर्शाया गया।मानसिक दासता का प्रतीक India that is BHARAT संविधान के एक अनुच्छेद में उल्लिखित है।
समस्त भारतीय अभिलेखों में हमारे देश का नाम भारत,आर्यावर्त तथा जम्बूद्वीप है।अत्यंत पुरातन एवं सनातन नाम है भारत,इस नाम से ही राष्ट्र की स्वर्णिम यादें दृश्य पटल पर आयतित होती है,गौरव की तीव्र अनुभूति होती है।नाम का जो महत्व होता है जिसकी भरपाई किसी भी वस्तु से नही की जा सकती है। लार्ड मैकाले की शातिर योजना भारत को इण्डिया बनाने की थी,जिसकी गलती तत्कालीन नेताओं से हुई।जिसके परिणामस्वरूप संविधान लागू होने के एक लंबे कालखंड के व्यतीत होने के पश्चात भी अंग्रेजी भाषा का एक मजबूत वर्चस्व आज भी अपने देश में है।
अनेक प्रयासों के बाद भी किसी भी न्यायलय में हिंदी भाषा को प्राथमिकता नही दी जा सकी है।सभी सरकारी वेबसाइटें,उच्च शिक्षा का माध्यम तक अंग्रेजी भाषा मे ही है,अंग्रेजी में ही हमारी प्रगति सुनिश्चित है इस तुच्छ मानसिकता का त्याग करके हमें अपनी मातृभाषा को बढ़ावा देना ही होगा।यदि परिवर्तन संसार का नियम है तो परिवर्तन भी समय के अनुकूल ही होना चाहिए।संविधान में आवश्यक संसोधन हमारे राष्ट्र की सजीवता को प्रमाणित करता है, यहाँ तक कि अम्बेडकर के जीवनकाल में भी अनेकों संसोधन हो चुके हैं।यदि आवश्यकता है तो संसोधन निश्चित ही होना चाहिये।ये कोई नई बात नही है अनेक देशों में संविधान की समीक्षा एवं संसोधन समय-समय पर होते रहे है।भारत का संविधान बहुत ही लचीला है। भारतीय संविधान के उद्देशिका में लिखा है कि हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न्,समाजवादी,पंथनिरपेक्ष,लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक न्याय,विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा,अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता को सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर इस संविधान को अंगीकृत करते हैं।परंतु इतने वर्षों के बाद भी समस्त नागरिकों की सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति समान नही हो सकी है,सामाजिक समरसता के उद्देश्य से आर्थिक संतुलन बनाये रखना ही वर्तमान की सबसे बड़ी आवश्यकता है।स्वतंत्र विचार की आड़ में कुछ राष्ट्र विरोधी तत्व भ्रंतियाँ फैलाते है और समाज को तोड़ने का कार्य करते हैं।
अपने भारतीय संविधान का अधिकांशतः भाग ब्रिटिश कानून का हिस्सा है,ब्रिटिश कानून पारित होने पर उसे कही कोई चुनौती नही दी जा सकती है इसके विपरीत अपने भारत देश मे संसद के कानून बनाते ही न्यायालय में चुनौती दी जाती है। जो एक प्रकार से अपने भारतीय संविधान की कमजोरी को दर्शाता है।
वर्तमान केन्द्र सरकार ने नागरिकता संशोधन जैसा कानून बनाया तो उसे भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। वहीं संसद द्वारा पारित कानून को कुछ राज्य सरकारों ने कहा कि हम अपने यहां सीएए लागू नहीं करेंगे। संसदीय प्रणाली में मजबूत विपक्ष का होना बहुत जरूरी है लेकिन वर्तमान के विपक्ष द्वारा बेवजह विरोध करने का कार्य किया गया है। सीएए के विरोध के नाम पर जनता को गुमराह किया गया जबकि यह स्पष्ट हो चुका है कि इसमें परिवर्तन अब नहीं होने वाला है। साथ ही सभी राज्य की सरकारें भी इस कानून को लागू करने के लिए बाध्य हैं क्योंकि नागरिकता संबंधी मसलों पर राज्य सरकारों की कतई नहीं चलती है।
भारत की जटिल न्याय प्रणाली के कारण ही आम आदमी को न्याय मिलना कठिन है। जिसमें सुधार करना अत्यंत आवश्यक है। ऐसी न्याय प्रणाली का निर्माण हो जो सरल रूप से यथा शीघ्र न्याय प्रदान करने वाली हो।पुलिसिया कानून में एक निश्चित बदलाव के साथ ही जनसंख्या नियंत्रण पर ‘एक समुचित और सुविचारित जनसंख्या नीति बनाई जानी चाहिए।
संप्रभुता को चुनौती देने वाले अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का ऐतिहासिक कार्य वर्तमान केंद्र सरकार ने किया। वहीं समग्र राष्ट्र की अस्मिता से जुड़े राम मंदिर जैसे महात्विक विषय का हल भी संविधान के दायरे में किया गया। आजादी के बाद लम्बे समयांतर तक समग्र राष्ट्र पर कांग्रेस का शासन था किन्तु कांग्रेस द्वारा समस्त राष्ट्र के मानबिन्दुओं की उपेक्षा के साथ ही लोकतंत्र का गला घोंटा गया। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोकतांत्रिक पद्धति द्वारा चुनी गयी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जबरन आपातकाल थोपकर लोकतंत्र के समस्त स्तम्भ को ध्वस्त कर दिया। ऐसी विकट परिस्थिति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लोकतंत्र का रक्षक बना। आदरणीय जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में देशभर में आन्दोलन किया गया,आपातकाल में 1,63,900 लोग सत्याग्रह कर जेल गये। 35 हजार संघ के स्वयंसेवकों को पुलिस द्वारा बंदी बनाया गया,63 स्वयंसेवक बलिदान हुए ।
आजादी के बाद से देश मे सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक पक्ष की निरन्तर उपेक्षा होती गई। आराध्य श्रीराम और श्रीकृष्ण इस राष्ट्र की सनातन संस्कृति के प्रेरणा पुरूष हैं।जिसको संविधान निर्माताओं ने संवैधानिक रूप से स्वीकार किया। पूरी दुनिया के लिए श्रीराम का रामराज्य प्रेरणादायी है। महात्मा गांधी ने भी एक ऐसे ही रामराज्य की कल्पना की थी। संविधान निर्माण के वक्त निर्माताओं ने भारतीय संविधान की मूल प्रति में हर अध्याय के प्रारम्भ में हमारी गौरवशाली सांस्कृति विरासत के प्रतीक चित्रों को अंकित किया था। जिसमें वैदिक काल में चलाए जा रहे गुरुकल,आराध्य श्रीराम का लंका विजय के बाद का चित्र, अर्जुन को गीता का उपदेश देते भगवान श्रीकृष्ण,भगवान बुद्ध, महावीर, सम्राट विक्रमादित्य और हमारी ज्ञान परम्परा के प्रतीक नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय के बहुमूल्य चित्र अंकित थे। अपनी कठोर तपस्याा द्वारा गंगा को धरती पर लाने वाले महानतपी भागीरथ,देवभूमि हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं के चित्र थे लेकिन संविधान की प्रति से सभी चित्र धीरे—धीरे एक समयांतराल के पश्चात कब और कैसे विलुप्त होते गए ये किसी को ज्ञात नही हुआ।
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