मैं ना होता तो क्या होता
यह हर किसी के साथ होता है जब कोई सोचता है कि मुर्गा बाँग नहीं देगा तो सवेरा कैसे होगा?
बड़े बड़े धुरंधर और सिकन्दर आए और मिट्टी में मिल गए।जिनको लगता था कि हमारी आज्ञा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता,वे भी अंतिम वक्त आने पर सूखे पत्ते की तरह जहान से ओझल हो गए। इसको स्पष्ट करने के लिए मैं यह कहानी साझा करता हूँ –
एक बार हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम से कहा कि अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ा,तब मुझे लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया,यह देखकर मैं गदगद हो गया !
“यदि मैं कूद पड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो क्या होता?”
बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मुझे भी लगता कि यदि मै न होता तो सीताजी को कौन बचाता ?परन्तु आज आपने उन्हें बचाया ही नहीं बल्कि बचाने का काम रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब मै समझ गया कि “आप जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं,वह उसी से लेते हैं,किसी का कोई महत्व नहीं है !”
आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो मै बड़ी चिंता मे पड़ गया कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है तो मै क्या करुं ?
पर जब रावण के सैनिक तलवार लेकर मुझे मारने के लिये दौड़े तो मैंने अपने को बचाने की तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है,”तो मै समझ गया कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने विभीषण ने यह उपाय कर दिया !”
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई,जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो मैं गदगद् हो गया कि उस लंका वाली संत त्रिजटा की ही बात सच थी,वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी,तेल,कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता,पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, “जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !”
“इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है,हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि… मै न होता/होती तो क्या होता?”
यह मैं न होती/ होता के अहंकार से बचने का एकमात्र विचार है।
अरे भाई,करता के हाथ हजार,तू काहे को करने चला?
लकीर का फ़कीर न बनें यह सोचकर कि भगवान करेगा जो करना है,हमें क्या करना?
हमें कर्मयोगी बनना है,निकम्मा नहीं।कर्म का फल यदि हमारे हित में हुआ है तो उसका अहंकार न करके हमें खुश होना चाहिए कि प्रभु ने उस कर्म फल का निमित्त हमको बनाया।
हनुमानजी जैसा दैवीय पुरूष सीता को रावण से छुड़ाने का महान योगदान करने के बाद भी यह नहीं कह रहा कि मैं न होता तो क्या होता।
सृष्टि का कोई काम किसी के न करने से रूकता नहीं है तो हमारा इसके संचालन में योगदान तो धूल के एक कण के बराबर भी नहीं है।