बचपन भी एक जमाना था….
बचपन भी एक जमाना था….
वो बचपन भी एक जमाना था,
ना प्यार, ना कोई फसाना था,
वो बचपन भी एक जमाना था, ना धन का लालच, ना ही दौलत कमाना था।
जाने वो दिन कब बीते,
जिनमें मनमानी कर हर बार हम जीते,
अब मनमानी करें भी तो किस से?
हट न पाएगा जिम्मेदारियों का बोझ सिर से,
न कल की फिक्र, न आज पर ध्यान लगाना था,
वो बचपन भी एक जमाना था।
बहुत कुछ खो गया वक्त के साथ, जहाँ दादी सुलाया करती थी, सुना के लोरी सारी रात ।
अब ना ढंग की नींद है, ना है चैन, भविष्य के सपने देख, थक गए मेरे नैन।
बात मानो, रखो माँ की गोद में सिर फिर एक बार,
तब लगेगा, दुनियाँ का दूसरा नाम ही है जीत और हार।
ना समझ के भी तब, सब था खुशहाल और मजेदार,
समझ के भी अब, कर ना पाया कुछ भी, मेरे यार,
उस समय लगता हर मौसम सुहाना था,
वो बचपन भी एक जमाना था।
कोई बताए इस दिल-ए-दिमाग को कैसे संभालू ?
कैसे करूँ कैद ? कैसे इस मना लूं ?
याद आते है स्कूल के वो दिन,
एक दिन ना रहा जाता था उन बेमतलबी यारों के बिन,
बचपन की राह छूटी, सब चेहरे अब अनजाने हैं,
जो थे जिगरी, वो तो बस अब अफसाने हैं,
क्यूँ नहीं समझता? सब यहाँ खुदगरजी हैं,
पिता ने था सब संभाला, अब तो अपनी मर्जी है,
इतने भी ज्ञान का बोध ना खुद को कराना था,
वो बचपन भी एक जमाना था, वो बचपन भी एक जमाना था।
–पलक सिंह
पलक सिंह, गोरखपुर निवासी और दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से बी.ए. 5वें सेमेस्टर की छात्रा, हिंदी साहित्य में रुचि रखने वाली एक उभरती लेखिका हैं। वह कविताओं के माध्यम से अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करती हैं, और रचनात्मक लेखन में अपनी पहचान बनाने की दिशा में प्रयासरत हैं।