कविता : पिता का पूर्वानुमान

एक पिता सब कुछ लुटा देता है अपने बेटे पर
अपनी जवानी, कमाई और सपने भी,
पीठ पर बिठाये टिक-टिक करता है,
कभी बिठा लेता है छाती पर,
बच्चों को अच्छा लगता है नाक मे ऊँगली करना और छाती के बाल नोचना
पिता मानता है हर बात अपने बच्चे की
कभी लाता है खिलौना तो कभी खुद खिलौना बन जाता है
कंधे बिठाये दिखाता है दुनिया |
अफ़सोस भी करता है कुछ खिलौने
और मिठाईयां न ला पाने का|
मंदिर मंदिर माथा टेकता है और
व्रत रखता है बच्चे की सफलता के लिए
पर श्रवण कुमार तो एक ही हुए,
फिर नहीं सुनाई पड़ा कोई और |
बेटे की अलग ही दुनिया है
ओ नकार देता है पिता की हर बात को
बोलता है पैसे बड़े मेहनत से आते हैं
व्यस्त है कारपोरेट लाइफ और
आधुनिकता की चका चौँध मे,
रोज शॉपिंग करना, और छुट्टियां लेके घूमना रूटीन है |
पिता जानता है लगभग हर बाप के साथ यही होता है,रीत है जग की |
बेटों को कहाँ समय अब पिता से बात करने का
बेटा ख़ुश रहे एक पिता को और क्या चाहिए
बुढ़ापे मे साथ नहीं है तो क्या हुआ
पैसे भेज देता है यदा-कदा
करा देगा चारोधाम और भंडारा भी मरने से पहले
उसके पिता के साथ भी यही हुआ था एकलौता जो था
चार बेटे होते तो भी यही होता,
बेटियों को हिस्सा नहीं मिलता पिता के सम्पति मे अभी तक,
मिलता है कोछा भर चावल, एक साड़ी और ताने भाभियों के |
हालांकि कविताएं बहुत हैँ पिता के पितृत्व पर और माँ की ममत्व पर आखिर कविताएं इसी ग्रह की हैँ
मंगल ग्रह से थोड़ी न लिखी गयीं हैं |
-श्याम नंदन पाण्डेय
मनकापुर, गोण्डा, उत्तर प्रदेश
यह भी देखें  कविता-अफसोस

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