ऑपरेशन सिंदूर पर संसद भवन में चर्चा, पीएम मोदी का बड़ा बयान – The Newswala

संसद भवन में इन दिनों देश की सुरक्षा और रणनीति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है—ऑपरेशन सिंदूर। यह सैन्य अभियान, जो 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में शुरू हुआ, ने न केवल क्षेत्रीय शांति को प्रभावित किया, बल्कि भारत की रक्षा नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी गहन बहस को जन्म दिया है। मानसून सत्र के दौरान, लोकसभा और राज्यसभा में इस मुद्दे पर 16-16 घंटे की विस्तृत चर्चा निर्धारित की गई, जो 28 और 29 जुलाई 2025 को आयोजित हुई।

28 जुलाई को लोकसभा में चर्चा की शुरुआत रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। उन्होंने भारतीय सेना की बहादुरी और ऑपरेशन सिंदूर की सफलता पर प्रकाश डाला, जिसमें आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। सिंह ने जोर देकर कहा कि यह अभियान भारत की संप्रभुता और एकता की रक्षा के लिए एक आवश्यक कदम था। इसके विपरीत, विपक्ष ने सुरक्षा चूक और पहलगाम हमले में शामिल आतंकियों के भागने जैसे सवाल उठाए। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने पूछा कि क्या इस तरह के हमलों को रोकने में खुफिया तंत्र में कमी रही, जबकि समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने क्षेत्रीय शांति के लिए दीर्घकालिक रणनीति की मांग की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 जुलाई को राज्यसभा में इस चर्चा में हिस्सा लिया और विपक्ष के सवालों का जवाब दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की शक्ति और संकल्प को दुनिया के सामने रखा। साथ ही, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि न्यूक्लियर ब्लैकमेलिंग जैसे खतरों के आगे भारत कभी नहीं झुकेगा। मोदी ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि कुछ नेता राष्ट्रीय हितों से ऊपर राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे देश की छवि को नुकसान पहुंच सकता है।

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विपक्ष, खासकर कांग्रेस और इंडिया गठबंधन, ने इस अभियान की समयबद्धता और परिणामों पर सवाल उठाए। राहुल गांधी ने मांग की कि सरकार पहलगाम हमले के लिए जिम्मेदार आतंकियों की पहचान और उनके खिलाफ कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट सदन में पेश करे। इसके अलावा, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सीजफायर दावों पर भी बहस हुई, जिसमें विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट किया कि इस अभियान में किसी तीसरे देश की भूमिका नहीं थी।

चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोक-झोंक देखी गई, फिर भी इसने राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक गंभीर संवाद को जन्म दिया। सरकार ने इसे ‘विजय दिवस’ के रूप में पेश करने की कोशिश की, जबकि विपक्ष ने इसे एक अवसर बनाया कि सरकार की नीतियों की जवाबदेही तय हो। इस बहस ने यह भी दिखाया कि देश की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर एकजुटता के बावजूद राजनीतिक मतभेद कितने गहरे हैं।

ऑपरेशन सिंदूर पर संसद भवन में हुई यह चर्चा न केवल एक सैन्य अभियान की समीक्षा थी, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और रक्षा रणनीति का आईना भी बनी। यह बहस भविष्य में होने वाली कार्रवाइयों के लिए दिशा-निर्देश प्रदान कर सकती है, बशर्ते सभी पक्ष राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखें। देशवासियों की नजर अब इस बात पर है कि इस चर्चा के परिणाम क्या होंगे और सरकार इन सुझावों को कैसे लागू करेगी।

लेखक: एम के पांडे

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