मन की शांति – पलक सिंह

मन की शांति न मिले बाज़ारों में,
न सोने, चांदी, उपहारों में।
यह तो बस इक दीपक जैसी है,
जलती है अंतर्मन के द्वारों में।

कोलाहल में जो चुप रह लेता है,
सच को हर हाल में सह लेता है।
वही पाता है उस सुख की थाती,
जो भीतर गहरे बह लेता है।

हर चाहत से जो ऊपर उठता है,
स्वार्थों की जंजीरें तोड़ता है।
वो ही पाता है शांत वो दरिया,
जो भीतर ही भीतर झरता है।

न क्रोध, न ईर्ष्या, न मोह बचे,
जब आत्मा का संग हो, सो बचे।
ध्यान की बूँदों से सिंचे जो जीवन,
उसका हर पल सुगंधित हो बचे।

शांति कोई मंज़िल नहीं, राह है,
यह तो बस खुद से एक चाह है।
जब खुद को खुद में पा लेता है मन,
तब ही मिलती सच्ची विश्रांति वहाँ है।

जो बाहर खोजे, वो भरमाएगा,
भीतर झांके, वही अपनाएगा।
शांति न कोई वस्तु है जग में,
यह तो बस अनुभव बन जाएँगा।

पलक सिंह, गोरखपुर निवासी, एक संवेदनशील हृदय और गहरी सोच वाली रचनाकार हैं, जो अपनी कविताओं के माध्यम से मन के गहरे भावों को शब्दों में ढालती हैं। वे वर्तमान में Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University से बीए (6th सेमेस्टर) की पढ़ाई कर रही हैं और साथ ही Stepping Stone Inter College, Maniram में शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं। उनकी कविताएँ न केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मिक शांति की ओर एक सहज आमंत्रण भी देती हैं। “मन की शांति” जैसी रचनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि उनका लेखन न केवल सुंदर है, बल्कि विचारशील और प्रेरणादायक भी है। पलक का मानना है कि साहित्य आत्मा की आवाज़ है, और जब यह हृदय से निकलकर शब्दों में ढलता है, तब वह अनेक दिलों को छू जाता है।

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