दर्द! इक मौन
जी हां,मैंने देखा है !
किसी को एक मछली की तरह,
तड़फड़ाते हुए मरना,
देखा है!
कैसे पोस्टमार्टम के वक्त ,
चीर दिया जाता है,इंसान का शरीर,
हां,देखा है!
कैसे सड़क दुर्घटनाओं में,
टूट जाता है शरीर का जर्रा जर्रा..!
और हां, देखा है!
बहुत ही करीब से,
कैसे बीमारियों के चपेट में आए
लोगो को तड़पते हुए,
जो इलाज के अभाव में सिर्फ तड़पते रहे!
हां देखा है!
बड़ी ही बेरहमी से लाचार उस बेटे को,
जिसे बता दिया जाता है,
उसकी मां अब अंतिम सांसे ले रही,
जिसका मरना तय है..!
हां बड़े ही करीब से देखा है
उस पिता को,
जिसे न चाहते हुए भी स्वीकार करना पड़ता है,
की उसका बेटा अब अंतिम सांसे ले रहा…!
मैं देखता रहा उस दिन
मेरे किसी अपने की लाश को
जो दधक कर जल रही थी,
उस चिता में..!
हां बड़े ही गहराइयों से महसूस किया है,
उस तपती गर्म में भी सर्द को..!
मगर इन सबके बाद भी
मैं महसूस नहीं कर पाता उन्हे
मैं खा लेता हू खाना खाना घर आकर
सो जाता हूं ओढ़कर चादर अपनी..!
क्योंकि…!
मैं जब आया किसी को दफना कर
जिसने दम तोड़ दिया था
सिर्फ इलाज के अभाव में
उस अस्पताल के वार्ड में
जहां सिर्फ हम तीन लोग थे..!
हां! केवल देखा ही नहीं बल्कि,
हृदय की अनंत गहराइयों से,
महसूस किया है हर उस दर्द को
जिसने मुझे अब शांत कर दिया है
मौन कर दिया है…!
निशांत श्रीवास्तव
‘अमेठी’ उत्तर प्रदेश