देख आज मैं किसी और की बात करता हूँ – आनन्द कुमार झा 

देख आज मैं किसी और की बात करता हूँ।
कुछ अपने और कुछ पुराने की बात करता हूँ।।
संस्कृत में संस्कृति बचाने की बात करता हूँ,
बहुत सी मुस्कुराते चेहरो को देखा हैं।
पर उसमें भरी ऊदासी के बादलों को भी देखा हैं।।
कुछ ऊलझनो में मैं भी हूँ, पर दिल के कोई पास नही हैं,
जिसे बता सकु दिलों की बात।।
रिश्ते सब जानते हैं।पर निभाना कोई और क्यों,
अब शायद मुस्कुराने के वो दिन गये शायद।
अब आगे बहुत सी मुसकिलों का एक घेरा सा हैं,
देख आज में किसी और की बात करता हूँ।
कुछ अपने और कुछ पुराने की बात करता हूँ।।
~ आनन्द कुमार झा

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