पिता की परछाईं
हर सुबह दरवाज़े पर
अब वो आवाज़ नहीं आती,
“उठ जा बेटा, देर हो रही है…”
वो मीठी झिड़की अब बहुत याद आती है।
कभी जो साए की तरह
मेरे पीछे-पीछे चलते थे,
आज वो बस यादों के
धुंधलके में मुस्कुराते मिलते हैं।
आपके बिना घर तो है,
पर घर जैसा कुछ नहीं,
आपकी हँसी व डांट की गूँज के बिना
ये दीवारें भी चुप हैं कहीं।
वो सिखाया हर सबक,
अब जीवन की मशाल बन गए,
आप तो चले गए पापा…
पर दिल में अमिट सवाल बन गए।
हर मुश्किल में आज भी
आपकी आँखें याद आती हैं,
जिनमें निश्चिंतता थी
कि “मैं हूँ ना, डर मत।”
आप थे तो सब कुछ था,
अब आप नहीं हैं,
तो सब अधूरा लगता है
फिर भी जी रहा हूँ, क्योंकि
आपकी सीख में ही मेरी सांसें चलती हैं।
अनोप भाम्बु
जोधपुर
