कविता – आतंकवाद का घिनौना रूप

कुछ बद्दिमाग खूंखार राक्षसों की काली करतूत,
मचाती हाहाकार, कष्ट से हो जाता विश्व द्रवीभूत,
निहत्थों पर वार चलाना कैसी शर्मनाक फितरत है ?
कायरता का जश्न मनाना ये कैसी बेकार शोहरत है ?

खून का बदला खून से क्या कर सकता भरपाई,
जिन्होंने अपने जीवन की खोई अनमोल ईकाई,
जन्म लेगी नफ़रत और भड़के की ज्यादा आग,
चलता रहेगा ये हत्याओं का खूनी दर्दनाक फाग ।

थू थू करता जग सारा तुम पर क्यों साख डुबोते हो ?
गड्ढा खोदते दूसरों के लिए व खुद ही गड्ढे में गिरते हो,
बद्दुआओं में जीकर कौन सा तीर मारा जीवन में ?
ख़ून की नदियां बहाई क्या मिला दहशत घुटन में ?

कैसी तालीम मिली तुमको इंसानियत को ही भूल गए ?
अपने ही मुल्क को बदनाम कर देश प्रेम को भूल गए ?
इस घृणित कर्म से न जाने कितने सिपाही मारे जाएंगे ?
लाल वो भी धरा के बेवजह क्रोध की बलि चढ़ जाएंगे ?

धर्म जाति के नाम पर लडाई करवा गंदा खेल रचते हो ?
क्यों शांति, प्रेम, अमन सुकून को कलंकित करते हों  ?
थम जाओ छोड़ दो ये हिंसा का दर्दनाक भयावह मंजर,
मासूमों के हाथ मत दो तुम्हारी नफ़रत का खूनी खंजर ।

कसूरवार हो तुम क्यों ईष्या घृणा फैला कर हंसते हो ?
किसी से प्रेम नहीं करते बस अहम् को सिद्ध करते हो ?
जो करना होगा वो तो देश की सरकारें निर्णय ले करेंगी,
जहर की इस फसल को जड़ समेत ही उखाड़ फेंकेगी ।

कांप रही है ये कलम आज आंखों की पलकें भी नम,
दुश्मनी की खाई क्यों नहीं होती इतने वर्षों बाद भी कम,
सुरक्षित नहीं इंसान कहीं भी इंसान ही बन बैठा दुश्मन,
“आनंद” नहीं जीवन में बढ़ी हर मन में चिंताएं उलझन ।

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–  मोनिका डागा  “आनंद”, चेन्नई, तमिलनाडु

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