पारदर्शिता की कुंजी: सूचना का अधिकार अधिनियम

सरकार के कार्यकलापों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने तथा भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगाने के लिए सरकार ने सूचना के अधिकार अधिनियम को अधिनियमित किया। जिसके द्वारा भारत ने सभी नागरिकों को यह अधिकार दिया है कि वह किसी भी सरकारी विभाग से सूचना प्राप्त कर सकता है लेकिन निजि कम्पनियों से नहीं, फिर भी यदि किसी निजि कम्पनी की जानकारी किसी सरकारी विभाग के पास है तो वह जानकारी इस कानून में प्राप्त कर सकते है। इससे पहले सरकारी अधिकारीगण अपनी कारगुजारियों को हर वक्त गोपनीयता के कानून का सहारा लेकर आपने आपको बचा लिया करते थे लेकिन अब यह सम्भव नहीं है क्योंकि अब हमें सरकार, पुलिस या प्रत्येक सरकारी विभागों (कतिपय छूट प्राप्त विभागों को छोड़कर) से किसी भी मामले की सच्चाई जानने एवॅ जवाब तलब करने का अधिकार प्राप्त हो गया है आज सफेदपो’k लोगों के काले चेहरे तेजी से उजागर होने लगे हैं, कई बड़े बड़े घोटाले सामने आ रहे हैं जिसके कारण दिग्गज हस्तियॉ भी अपने आपको नहीं बचा पा रही हैं जिसके परिणाम स्वरूप कई श्लाखों के पीछे पहुॅच चुके हैं। कुछ राज्यों में तो इस अधिकार पर लगाम लगाने के लिए इसके लिए किए जाने आवेदन पर लगने वाले 10 रू. के शुल्क को बढ़ाकर 500 रू. तक कर दिया है। जिससे कई लोग तो इतना शुल्क देखकर ही सूचना मांगने से हतोत्साहित हो जायें। इतना ही नहीं किसी दस्तावेज की एक फोटो प्रति लेने के लिए 15 रूप्ए देने होंगे, जबकि पहले इसके लिए मात्र 1 रूप्या लगता था, दूसरी तरफ कुछ राज्यों ने आवेदन की शब्द सीमा 150 शब्द तय कर दी है। इससे ज्यादा शब्द का आवेदन स्वीकार ही नहीं किया जायगा। अभी हाल ही एक सूचना के अधिकार के तहत दिए गये आवेदन के जवाब से मालुम पड़ा कि कई पूर्व मंत्री, संसदीय सचिव, अफसर तथा धनाढ़्य वर्ग तक के व्यक्ति सरकारी अस्पतालों में गरीब बनकर मुफ्त में जांचें करा रहे थे और ‘फ्री पूअर’ कैटेगरी में इलाज करा रहे थे जिनकी एमआरआइ तथा सीटी स्कैन जैसी जांचे भी निःशुल्क की जा रही थी जबकि इन जांचों की सरकारी न्यूनतम फीस ही कम से कम 2,000 रू. है। अतः अगर इस कानून का सदुपयोग किया जाय तो वास्तव में यह एक क्रान्तिकारी कानून है और सुशासन की ओर एक सकारात्मक पहल है। लेकिन यहॉ यह भी ध्यान देने वाली बात है कि हमें इस कानून का सदुपयोग ही करना चाहिए, फिजूल की सूचनाएं मांग कर बेवजह सरकारी मशीनरी का समय बर्बाद नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे भी हमारा ही नुकसान होगा। इसमें दिए गये शास्ति के प्रावधानों के कारण सम्बन्धित अधिकारी या कर्मचारी पहले उससे मांगी गई सूचना को एकत्रित करके देने में ही लगा रहेगा चाहे उसके अन्य आवश्यक सरकारी कार्यों में देरी हो रही हो, तो भी वह पहले इस जिम्मेदारी को पूरा करना चाहेगा और शास्ति से बचे रहना चाहेगा। एक व्यक्ति ने डीईओ का पूरा रिकार्ड ही मांग लिया, जिसके दस्तावेजों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि अगर वह सारे दस्तावेज दिए जाते तो एक मिनी ट्रक भर जाता और इतने दस्तावेजों को इकठ्ठा करने में विभाग के सारे कर्मचारियों के कई महिने लग जाते। इसलिए आवेदनकर्ता को भी ऐसा नहीं करके जो दस्तावेज वास्तव में आवश्यक हो, उनकी सूची बनाकर देनी चाहिए, ताकि आवेदनकर्ता का उद्धेश्य भी पूरा हो जाय और सरकारी अधिकारियों एवॅ कर्मचारियों का समय भी फिजूल में व्यर्थ नहीं हो। वैसे सूचना में रिकार्ड, दस्तावेज, ईमेल, राय, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश, लॉगबुक, अनुबन्ध, रिपोर्ट, नमूने, मॉडल, किसी भी इलैक्ट्रोनिक रूप में रखा गया डेटा और सूचना आदि शामिल है जो किसी भी सरकारी अधिकारी से मांगी जा सकती है। कोई संस्था किसी सूचना को प्राप्त करने के लिए आवेदन नहीं कर सकती है लेकिन उस संस्था का कोई अधिकारी आवेदन करके सूचना ले सकता है।

सूचना का अधिकार कानून के लिए भारत में मजदूर किसान शक्ति संगठन (एम.के.एस.एस) नामक संगठन ने 1990 में राजस्थान राज्य के अत्यंत पिछड़े क्षैत्र बीवर में एक प्रशासनिक अधिकारी अरूणाराय के नेतृत्व में प्रयास प्रारम्भ किये गये थे, जिन्होंने विकास तथा अकाल सम्बन्धी स्थिति के सरकारी आंकड़ों को सार्वजनिक करने के लिए आन्दोलन किया और इसके फलस्वरूप कुछ दस्तावेजों की छाया प्रतियॉ प्राप्त करने में सफलता भी प्राप्त की। फिर लगातार प्रयासों के परिणामस्वरूप राजस्थान में वर्ष 2000 में ही सूचना का अधिकार, कानून के रूप में सामने आ गया, जब कि केन्द्रीय सूचना का अधिकार अधिनियम 12 अक्टुबर, 2005 को लागू किया गया। जिसके लिए आवेदन सरकार या सक्षम अधिकारी के द्वारा बनाए गये नियमों के अनुसार निर्धारित शुल्क प्रार्थनापत्र के साथ देना होगा। जब सूचना की प्रति तैयार हो जाती है तो अतिरिक्त शुल्क की गणना करने के बाद उसका भी भुगतान आवेदनकर्ता को करना होता है। अगर कोई लोक सूचना अधिकारी सूचना देने में किसी प्रकार की गफलत करता है, मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं कराता है या मांगे गये तरीके से भिन्न तरीके से सूचना उपलब्ध कराता है या अपर्याप्त सूचना देता है या सूचना उपलब्ध कराने में देरी करता है तो ऐसे लोक प्राधिकारियों पर शास्ति लगाये जाने के प्रावधान हैं अगर कोई अधिकारी समय पर सूचना नहीं देता है तो उस पर 250 रूप्ये प्रतिदिन के हिसाब से शास्ति लगाई जा सकती है जो अधिकतम 25000 रूप्ये तक की हो सकती है साथ ही उस पर अनुशासनात्मक कार्यवाही भी की जा सकती है। यहॉ तक कि अगर सूचना किसी व्यक्ति के जीवन के अधिकार से सम्बन्धित है तो सम्बन्धित अधिकारी को वह सूचना 48 घण्टे के भीतर ही उपलब्ध करानी होगी। अगर आवेदक दी गई सूचना से असन्तुष्ट हो तो उसकी अपील अपीलीय अधिकारी के समक्ष करनी होती है। और अगर उसके निर्णय से भी सन्तुष्ट नहीं हो तो यथास्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील कर सकेगा। दोनों ही अपीलों को पेश करने के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लगाया गया है।

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अगर किसी प्राधिकारी के पास उपलब्ध कोई सूचना मूल रूप से किसी दूसरे व्यक्ति से सम्बन्धित होती है तो वह तृतीय पक्षकार से सम्बन्धित सूचना मानी जाती है, ऐसी सूचना तभी दी जा सकती है जब उस तृतीय पक्षकार को पहले इसके सम्बन्ध में सूचना देकर उसकी कोई आपत्ति हो तो उसे सुना जायगा। वह तृतीय पक्षकार ऐसी संसूचना की प्राप्ति के दस दिन के अन्दर प्रस्तावित प्रकट्न के विरूद्ध अपना प्रतिवेदन दे देता है, तो उस पर विचार करके लोक सूचना अधिकारी सूचना के प्रकट्न पर निर्णय लेगा। यदि लोक सूचना अधिकारी का निर्णय उस तृतीय पक्षकार के विरूद्ध होता है तो वह धारा 19 के अन्तर्गत अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील कर सकता है, और अपीलीय प्राधिकारी के निर्णय के खिलाफ भी वह तृतीय पक्षकार द्वितीय अपील प्राधिकारी यथास्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील कर सकेगा। यदि उक्त सूचना को प्रकट करना, तृतीय पक्षकार को होने वाली हानि की अपेक्षा लोक हित में अधिक आवश्यक है तो ऐसी सूचना के प्रकटन की अनुमति दे दी जाएगी। यानि कि लोक सूचना अधिकारी को तुलनात्मक लोकहित को मापना पड़ेगा कि सूचना के प्रकटन तथा तृतीय पक्षकार द्वारा गोपनीय मानी गई सूचना के बीच अन्तर्निहित लोकहित में जिसका पलड़ा भारी हो, उसीके अनुसार निर्णय लेना होगा। सूचना प्राप्त करने के लिए इच्छुक व्यक्ति को इस आशय का एक लिखित आवेदन पत्र हिन्दी या अंग्रेजी में या उस स्थान की अधिकारिक भाषा में प्रस्तुत करना होगा। इलेक्ट्रानिक युक्ति के माध्यम से भी निर्धारित शुल्क के साथ आवेदन कर सकता है। यदि आवेदनकर्ता अपना आवेदन मौखिक रूप से करता है तो केन्द्रीय या राज्य लोक सूचना अधिकारी को उसे लिखित में आवेदन करने में सहायता करनी होगी। इस कानून में एक विशेष प्रावधान यह भी है कि आवेदनकर्ता को वांछित सूचना प्राप्त करने के लिए कोई कारण बताने की आवश्यकता नहीं होती है बस सिर्फ अपना नाम और पता तथा सम्पर्क का विवरण देने की आवश्यकता होती है ताकि उससे सम्पर्क किया जा सके। अगर चाही गई सूचना उस लोक सूचना अधिकारी के पास नहीं हो तो यह उस लोक सूचना अधिकारी की जिम्मेदारी है कि वह उस प्रार्थनापत्र को सम्बन्धित प्राधिकारी के समक्ष अधिकतम पांच दिनों के अन्दर अग्रसित कर दे और आवेदनकर्ता को उस प्राधिकारी के वृतान्तों के बारे में सूचित कर दे, ताकि वह उससे सम्पर्क कर सके। इसके अलावा अगर मांगी गई सूचना का कुछ भाग किसी दूसरे लोक प्राधिकारी से सम्बन्धित है तो ऐसी स्थिति में वह लोक सूचना अधिकारी अपने विभाग से सम्बन्धित भाग के लिए कार्यवाही करके बाकी सूचना के लिए सम्बन्धित लोक प्राधिकारी को वह आवेदन हस्तांतरित कर देगा। इस प्रकार लोक सूचना अधिकारियों के पास यह बहाना करने का कोई मौका नहीं छोड़ा गया है कि वह यह कह सके कि चाही गई सूचना उसके पास नहीं थी इसलिए नहीं दी गई थी, और हस्तांतरण के लिए भी अवधि निर्धारित कर दी गई है जो भी सिर्फ पांच दिन ही है, इस अवधि में अगर वह कार्यवाही नहीं करे तो वह शास्ति का जिम्मेदार माना जायगा। कई बार ऐसा भी होता है कि आवेदक कोई सूचना प्राप्त करना चाहता है लेकिन उसे पत्रावली के बारे में पूरा विवरण मालूम नहीं हो तो वह सम्पूर्ण पत्रावली का निरीक्षण भी कर सकता है और फिर उसमें से जो उसके अनुसार आवश्यक सामग्री है, उसकी मांग कर सकता है। सामान्यतः आवेदनों में वांछित सूचना आवेदक को 30 दिनों में उपलब्ध करा दी जानी चाहिए और यदि मांगी गई सूचना किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित हैं, तो उससे संबंधित आवेदन/अनुरोध का निपटारा 48 घंटों में कर दिया जाना चाहिए। यदि उपरोक्त अवधि में आवेदन का निपटारा नहीं किए जाता है तो यह माना जायगा कि उस आवेदन को नामंजूर कर दिया गया है। यदि किसी सूचना के लिये आवेदन सहायक लोक सूचना अधिकारी के समक्ष किया जाता है तो उपरोक्त समय में 5 दिन और जोड़ दिया जायेगा, यदि किसी सूचना में तीसरे पक्षकार का हित निहित है, तब यह समय सीमा 40 दिन की हो जायगी। यदि सूचना उपलब्ध कराने के लिए निर्धारित शुल्क के अलावा भी ओर कोई शुल्क देय है तो ऐसा शुल्क जमा कराने हेतु आवेदक को सूचित किया जायेगा। यदि आवेदक किसी अभिलेख तक पहुँचने में निःशक्त है तो केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी के द्वारा उसे ऐसी पहुँच को सुगम कराने में सहायता करनी होगी। सामान्यतः सूचना उसी प्ररूप में उपलब्ध कराई जाएगी जिस प्ररूप में वह चाही गई है और 20 साल से अधिक पुरानी सूचना भी प्राप्त की जा सकती है।

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निम्न सूचनाओं को देने से इन्कार किया जा सकता है-

(1) जिनके प्रकटन से भारत की सम्प्रभुता, तथा अखंडता, राज्य की सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हित, या विदेशों के साथ सम्बन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो या किसी अपराध को करने का उद्दीपन होता हो।

(2) ऐसी संसूचना जिसके प्रकाशन पर किसी न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा अभिव्यक्त रूप से निशिद्ध किया गया हो या जिसके प्रकटन से न्यायालय की अवमानना होती हो।

(3) ऐसी संसूचना जिसके प्रकटन से संसद या किसी राज्य की विधान सभा के विशेषाधिकार का हनन होता हो।

(4) ऐसी संसूचना जिसमें वणिज्यिक विश्वास, व्यापारिक गोपनीयता अथवा बौद्धिक सम्पदा सम्मिलित है, जिसके प्रकटन से किसी तीसरे पक्षकार की प्रतियोगी स्थिति को नुकसान पहुँचता हो, और ऐसी सूचना जिसके लिए सक्षम प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसी संसूचना का प्रकटन व्यापक/वृहत्तर लोक हित में वांछित हैं।

(5) ऐसी सूचना जो विदेशी सरकारों से विश्वास में प्राप्त की गई हो,

(6) ऐसी संसूचना जिसका प्रकटीकरण किसी व्यक्ति के जीवन या उसकी शारीरिक सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है,

(7) जिससे विधि प्रवर्तन या सुरक्षा प्रयोजनों के लिये विश्वास में दिये गये सूचना या सहायता के स्त्रोतों की पहचान हो सकती हो,

(8) ऐसी संसूचना, जो अन्वेषण की प्रक्रिया या अपराधियों की गिरफ्तारी या अभियोजन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करती हो,

(9) मंत्रीमंडल के दस्तावेज, जिसमें मंत्रि परिषद्, सचिवों और अन्य अधिकारियों की वार्ता का अभिलेख सम्मिलित है,

(10) ऐसी संसूचना जो व्यक्तिगत सूचना से सम्बन्धित है, जिसके प्रकटन का किसी लोक क्रियाकलाप या हित से कोई सम्बन्ध नहीं है या जिससे किसी व्यक्ति की गोपनीयता में अनावश्यक हस्तक्षेप होता हो,

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(11) उपरोक्त सूचीबद्ध किन्हीं अभिमुक्तियों के होते हुये भी कोई लोक प्राधिकारी संसूचना देने की अनुमति इस आधार पर दे सकता है कि उसके प्रकटन से अधिक लोकहित होगा, बजाय उसके संरक्षित हित से होने वाली हानि से। अतः ऐसे मामलों में लोक प्राधिकारी की संतुष्टि अधिक महत्व रखती है, अर्थात् सूचनाओं के प्रकटन में लोक हित को अधिक महत्व दिया गया है।

इसके अलावा अधिनियम की धारा (2) की उपधारा (एफ) और (जे) के अनुसार आवेदक काल्पनिक प्रश्न नहीं पूछ सकता है जो सार्वजनिक प्राधिकरण के रिकार्ड में नहीं हो।

कुछ संस्थाएं जैसे केन्द्रीय अभिसूचना तथा सुरक्षा अभिकरण जैसे आई.बी., रॉ., राजस्व अभिसूचना निदेशालय, केन्द्रीय आर्थिक अभिसूचना ब्यौरों, प्रवर्तन निदेशालय, नारकोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो, विमानन अनुसंधान केन्द्र, विशेष सीमान्त बल, बी.एस.एफ. सी.आर.पी.एफ. टी.बी.पी.सी.आई.एस.एफ.एन.एस.जी. असम राइफल्स, विशेष सेवा ब्यूरों, विशेष शाखा (सी.आई.डी.) अण्डमान तथा निकोबार, अपराध शाखा सी.आई.डी.सी.बी., दादर, नागर हवेली तथा विशेष शाखा, लक्षद्वीप पुलिस, अधिसूचना के माध्यम से राज्य द्वारा विनिर्दिष्ट अभिकरण आदि को सूचना देने से छूट है। फिर भी ये संगठन भी भ्रष्टाचार तथा मानव अधिकार के उल्लघंन से सम्बन्धित सूचना देने के लिये बाध्य हैं।

अगर केन्द्रीय या राज्य लोक सूचना अधिकारी के विनिश्चय आवेदनकर्ता के प्रतिकूल होता है या जहां ऐसे व्यक्ति को विनिर्दिष्ट समयावधि में सूचना तक पहुँच के बारे में कोई विनिश्चय प्राप्त नहीं हुआ हो, तो व्यथित व्यक्ति 30 दिन के अन्दर उससे वरिष्ठ अधिकारी के समक्ष अपील कर सकेगा, इसे सादे कागज पर लिखित में पांच प्रतियों में दिया जाना चाहिए। यदि उस वरिष्ठ अधिकारी का आदेश भी आवेदनकर्ता के विरूद्ध होता है तो यथास्थिति केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग के समक्ष 90 दिनों की समयावधि के अन्दर द्वितीय अपील पेश कर सकता है। प्रथम अपील के निपटारे की अवधि यथा सम्भव 30 दिनों की होगी, यदि इस समयावधि में अपील तय करना सम्भव नहीं हो सके तो कारण लेखबद्ध करते हुए इसका निस्तारण 45 दिनों में कर दिया जाना चाहिए। यह 45 दिनों की समयसीमा किसी भी दशा में नहीं बढ़ाई जायगी। जबकि द्वितीय अपील का निस्तारण 45 दिनों के अन्दर कर दिया जाना चाहिए।

इस प्रकार हम देखते हैं कि यह क्रान्तिकारी कानून हमारी विधायिका ने तो हमें दे दिया है अब यह हम पर है कि हम इसका कितना और कैसे उपयोग करते हैं। क्योंकि एक जागरूक एवॅ कर्त्तव्यपरायण नागरिक ही किसी कानून का सदुपयोग कर सकता है। इसका इतना महत्व देखते हुए ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने 28 सितम्बर को अन्तर्राष्ट्रीय सूचना का अधिकार दिवस घोषित कर दिया है। हालांकि इस अधिनियम में अब तक कई संशोधन भी कर दिए गये है लेकिन प्रमुख रूप से 2019 और 2023 में हुए है, जिनके द्वारा मुख्य सूचना आयुक्तो और सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन को केन्द्र सरकार के नियंत्रण में ला दिया और 2023 के संशोधन के द्वारा सभी व्यक्तिगत सूचनाओं को सूचना के अधिकार में प्रकटीकरण से छूट दे दी है।

ज्ञानवती धाकड़, एडवोकेट

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