असमानताएँ, जीने के तरीके और गरीबी का दंश
आप को सजगता और बारीकी से देखने की जरूरत है अपने आस पास और अपने चारों ओर, सीखने और उसके इम्प्लीमेंटेशन से परिपक्वता आती है और सफलता मिलती है। हम टाटा, बिरला बिलगेट्स ,अदानी अम्बानी , बिलगेट्स, एलन मस्क, मार्क जुकरबर्ग और दूसरे सलिबर्टीज़ को देखते हैं उनके जैसा बनना चाहते हैं कोई भी गरीब बनना नहीं चाहता।
थोड़ा कम सोच पाते हैं तो अपने आस पास या शहर के सबसे अमीर आदमी के जैसे जीवन जीना चाहते हैं हम में से कई मेहनत, ईमानदारी और लगन से सफल हो जाते हैं अमीर हो जाते हैं।जबकि हमारे आस-पासबहुत सारे गरीब लोग होते हैं कुछ तो अति गरीब और भीख मांगते हैं। कम से हारने पर या असफल होने पर तो सोचते होंगें कैसे मुश्किल से हमारे आस-पास वो गरीब और अति गरीब परिवार रहता है।
अगर आप दोनों परिस्थितियों में उन्हें याद रखते हो और सफल होने के दौड़ में शामिल होने के साथ-साथ उनके भलाई के लिए भी सोच रहे है और अवसर ढूंढ कर मदद करते हो तो आप मनुष्य हैं आप जीवित हैं।
जन्मदिन और अन्य अवसरों पर केक मुंह और कपड़ों पर पोतने और खाना बर्बाद करने की जगह अपने आस पास के जरूरतमंदो को भेंट दें।
ये लेख शायद आप को किसी निष्कर्ष पर न छोड़े इसका निस्कर्ष आप को खुद तय करना है।
हो सकता है आप मे से अलग-अलग लोग इस लेख से अलग-अलग निस्कर्ष पर पहुंचे मोरल और ऑफ द आर्टिकल आप ही तय करें।(यथा दृष्टि तथा सृष्टि )
जुलाई माह में लगभग 30 बॉलीवुड फिल्में और 4 फिल्में हॉलीवुड की और बॉलीवुड से ज्यादा तमिल (कॉलीवुड) और ऐसे ही तेलगु (टॉलीवुड)और कन्नड़ फिल्में भी देश मे रिलीज हुई।
अगस्त माह में लगभग 40 फिल्में बॉलीवुड और हॉलीवुड की 2 फिल्में और बॉलीवुड की लगभग दूनी फिल्में तमिल और 10-15 ही तेलगु और कन्नड़ की फिल्में रिलीज हुई
जुलाई मे रिलीज कुछ बड़ी बॉलीवुड फिल्में रणवीर और आलिया की रॉकी और रानी की प्रेम कहानी,रवीना टंडन और मिलिन्द सोमद की वन फ्राइडे नाईट, वरुण धवन और जाहनवी कपूर की बवाल बॉलीबुड
नागा शौर्य स्टाटरर तेलगु फ़िल्म रंगाबाली
हॉलीबुड की मिशन इम्पॉसिबल-7 और ओपेनहायमर दोनों फिल्मों का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 80 करोड़ के ऊपर पहुंच चुका है अगस्त अंत तक और गदर-2 (बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 450 करोड़ अगस्त अंत तक)
अगस्त की बॉलीबुड की बड़ी फिल्मों में ओएमजी-2(बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 150 करोड़ अगस्त अंत तक) और गदर-2 (बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 350 करोड़ अगस्त अंत तक) रजनीकांत स्टारर तमिल फिल्म जेलर (बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 350 करोड़ अगस्त अंत तक), 50 करोड़ से 100 करोड़ तक कमाने वाली फिल्मों जिक्र ही नहीं कर रहा हूं।
ये सारा कलेक्शन (घरेलू है) भारत मे हुआ है। अगर 100 करोड़ तक की फिल्मों का भी एवरेज देखें तो और एवरेज 50 करोड़ मान लें तो इस अम्ब्रेला के अंदर लगभग 20 फिल्में होंगी और माह में एक हजार करोड़ होगा और अगस्त की 100 करोड़ से अधिक की कमाई करने वाली फिल्मों की कुल कमाई का एवरेज एक हजार करोड़ से ज्यादा होगी मतलब लगभग 2 हजार करोड़ हम लोगों ने फिल्म इंडस्ट्री को दे दिए एक माह में साल भर में 24-25 हजार करोड़ फ़िल्म इंडस्ट्री में जाता है।
अभी इसी माह सितम्बर में शाहरुख स्टारर जवान रिलीज हुई जो 600 करोड़ पार कर लेगी सितम्बर के अंत तक।
कोरियन फिल्में और वेब सीरीज भी आजकल भारत मे बहुत पसंद की जाती है टॉलीवुड, कन्नड़, मलयालम और तेलगु तो शुरू से अच्छे कंटेंट की फिल्में परोस रहें हैं पहले उतनी पहुंच नही थी लोगों की पर अब लोग बॉलीवुड से ज्यादा साउथ इंडियंस और अन्य रिजनल फिल्में भारतीय युवा अब ज्यादा पसंद कर रहे हैं और करना भी चाहिए कम बजट की अच्छे कंटेट को पर्याप्त ऑडियंस मिलने चाहिए
OTT ओटीटी पर रिलीज फिल्मों और वेब सीरीज की गिनती नही कर रहा हूँ इस लेख में क्यों कि ओटीटी प्रीपेड और सब्सक्रिप्शन बेस हैं।
सारे आंकड़े फिल्मी फ्राइडे डॉट कॉम, फिल्मिबात, बॉलीमूवी रिव्यु और ट्रैक टॉलीवुड के हैं।
बॉलीवुड दुनिया का सबसे सबसे बड़ा फ़िल्म उद्योग है और भारत मे प्रतिवर्ष 20 से अधिक भाषाओं में 1500-2000 फिल्में रिलीज होती हैं।स्टेटिस्टा की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री की वैल्यू 191 बिलियन यानी 19 हजार 100 करोड़ रुपए दर्ज की गई थी,जो साल 2024 तक 206 बिलियन यानी 20 हजार 600 करोड़ रूपये पहुंचने का अनुमान है. इसमें से सबसे ज्यादा कमाई डोमेस्टिक थियेट्रिकल रेवेन्यू से हुई, लगभग 5 लाख लोग फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े हैं यदि टॉलीवुड, कॉलीवुड और अन्य क्षेत्रीय फिल्मों की वैल्यू भी जोड़ दें तो लगभग 25 हजार करोड़ रुपये सालाना की वैल्यू है भरतीय फ़िल्म इंडस्ट्री की।
ये सारी कमाई दर्शकों की जेबों से होती है जिसमें हम सब गरीब, अमीर और मीडिल क्लास के लोग आते हैं
किसी भी फिल्म को तैयार होने में तीन चरण में काम होता है. पहला-प्री प्रोडक्शन, दूसरा-प्रोडक्शन और तीसरा होता है पोस्ट प्रोडक्शन। प्री प्रोडक्शन स्टेज में फिल्म की शूटिंग, कहानी को लेकर काम किया जाता है और प्रोडक्शन में फिल्म की शूटिंग की जाती है और तीसरे चरण में शूटिंग के बाद का काम होता है, जिसमें एडिटिंग, मार्केटिंग,प्रोमोशन आदि शामिल होते हैं।
और इस पूरी प्रक्रिया में ऐक्टर्स को मिलाकर 100 से अधिक लोगों की टीम होती है लेखक, डाइरेक्टर प्रोड्यूसर्स से लेकर टेक्निकल टीम, लीगल टीम और स्पॉट बॉय तक 6 माह से 1 वर्ष तक काम करके एक 3 घण्टे की फ़िल्म बनाते हैं
राजनैतिक पार्टियों को बनाने और चलाने में लोकसभा, राज्यसभा से लेकर पंचायत स्तर तक की सीटों पर उम्मीदवार और पार्टी की छवि सुधारने और बनाने में बहुत खर्च लगते हैं। राज्यीय और राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों की संख्या 65 से 70 हैं। गैर मान्यता प्राप्त पार्टियों की संख्या 2500 से अधिक है इन पार्टियों को लोगों से जुडने और चुनाव अभियान के दौरान सार्वजनिक बैठकों, रैलियों, विज्ञापनों, पोस्टर, बैनर, वाहनों और अन्य विज्ञापनों पर बहुत खर्च करने पड़ते हैं।
वर्ष 2020 में भारतीय चुनाव आयोग (ECI) द्वारा लोकसभा क्षेत्रों के उम्मीदवारों के लिये खर्च की सीमा जो पहले 54 लाख से 70 लाख रुपए (राज्यों के आधार पर) थी उसे बढ़ाकर 70 से लाख-95 लाख रुपए कर दी गई थी।
और विधानसभा क्षेत्रों के लिये खर्च की सीमा 20 लाख-28 लाख रुपए से बढ़ाकर 28 लाख- 40 लाख रुपए (राज्यों के आधार पर) कर दी गई थी।
2019 के लोक सभा के चुनाव में 60000 करोड़ ख़र्च किया गया सभी पार्टियों द्वारा जिसमें वोट को खरीदने की कीमत नहीं जोड़ी गयी है मतलब प्रति वोटर 700 रुपये खर्च किये गए जिसमें सबसे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी द्वारा खर्च किया
2019 लोक सभा चुनाव से भारत मे चुनाव का खर्च दुनिया का सबसे अधिक चुनावी खर्च बन गया।
ये सारे खर्च उम्मीदवार अपने घर से नहीं लगाते बल्कि जनता से वसूले जाते हैं जिसमें हम सब गरीब, अमीर और मीडिल क्लास के लोग आते हैं
जिसके लिए सरकारे प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष टैक्सों को बढ़ाती हैं, डीजल, पेट्रोल और गैस के साथ-साथ रोजमर्रा की चीजें भी मंहगी हो जाती हैं। आम आदमी से वसूली के तमाम साधन बना लेती हैं सरकारें।
पृथ्वी पर मौजूद कुल संसाधनों का 40-45 प्रतिशत हिस्से का उपभोग सिर्फ 2-3 प्रतिशत लोग कर रहे हैं।
जबकि प्राकृतिक संसंधनो पर सम्पूर्ण मानव जाति और अन्य जीवों का समान अधिकार है।
भारत मे पिछले 1 दशक में 85-90 स्टार्टअप यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो चुके हैं।
जबकि सिर्फ 2021 में 42 स्टार्टअप्स यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हुए हैं।
देश में प्रतिवर्ष अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है वर्ष 2020 से 2022 तक 65 नये अरबपति बने।
देश की 40 प्रतिशत संपत्ति सिर्फ 1 प्रतिशत अमीर लोगों के पास है
अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और गरीब क्यों जो एक बार अमीरों की लिस्ट में आ गया वो संसाधनों और सिस्टम पर अपना अधिकार समझता है और परस्पर फायदे के लिए सिस्टम भी हर अवसर इन्हें ही देता है।गरीब और पिछड़े लोगों को अवसर नहीं मिलता कुछ नया शुरू करने पर सरकारें और सिस्टम सपोर्ट नहीं करता अवसर और समय इनके हाथ से निकल जाते है और पीछे राह जाते हैं।
इच्छाओं का अंत नहीं होता ये बढ़ती ही जाती हैं। अमीर और सफल व्यक्ति और बड़ी सफलता और अधिक सम्पति के लालच में अपनी जिम्मेदारियों और नैतिकता पर ध्यान देने से ज्यादा अधिकार बढ़ाने में जुटा रहता है।
अब बहुत कमा लिया, नाम कर लिया, सभी सुविधाएं भोग ली अब बस ऐसा कोई नहीं सोच पाता सांस चलने तक लगे रहते हैं संपत्ति जुटाने में।
ये असमानताएं ही गरीबी को गरीब ही बने रहने देती और अति गरीबी को जन्म देती है।
हम परिवार में रहते हैं यदि बात करें संयुक्त परिवार की
तो उसमें दादा-दादी, चाचा चाची माता-पिता और भाई-बहन अमूमन 8-10 लोगों का परिवार
अगर पिता एकलौते संतान थे तो दादा-दादी, माता-पिता और भाई बहन परिवार सिर्फ पति-पत्नी और उनके बच्चों से ही नहीं बनता परिवार हमे दूसरों के बारे में सोचना सीखता है, त्याग सिखाता है एक दूसरे का खयाल रखना सिखाता है, और कोम्प्रोमाईज़ करना सिखाता है।
अपने बच्चों से तो दुनिया के हर लोग प्यार करते हैं अपने बुजुर्ग मां-बाप से और उनके दूसरी संतानों से भी प्यार करना परिवार सिखाता है और तभी परिवार बनता है।
हमारे सामने समाज की ऐसी तस्वीरें आती हैं जो अवाक कर देती हैं सोचने पर मजबूर कर देती हैं।
बच्चे अपने बुड्ढे माँ बाप को मेले छोड़ देते हैं, स्टेशनों पर छोड़ देते हैं घर पर सबकुछ होते हुए भी बृद्ध आश्रम में छोड़ जाते हैं।
तो कोई माता पिता अपने सोच और सपने थोप देते हैं।
तो कहीं टीचर द्वारा किया जा रहा भेद भाव या बच्चों की अनावश्यक और अति पिटाई करने का दृश्य सामने आता रहता है। कहीं न कहीं हम परिवरिश और नैतिकता में चूक रहे हैं जिस से ये घटनाएं आम हो रही हैं।
बदलाव हमेशा दिक्कत देता कुछ दिन मुश्किल होते हैं और परिवर्तन स्वीकारने में संकोच करते हैं।
अगर गांव में सड़क और खड़ंज्जे बनेंगे तो जमीम गाँव वालों की ही जाएगी हमारी और आप की ही जायेग़ी पर हमेशा के लिए ठंढ़ी, गर्मी और बरसात में आसानी से और जल्दी से हम मुख्य सड़क पर पहुंच जाएंगे हमारे स्कूल, अस्पताल और शहर जाने में सुविधा होगी साथ साथ समय की भी बचत होगी।
किसी भी गाँव मे स्कूल, लाइब्रेरी और सार्वजनिक भवन बनेंगे तो उसका उपयोग गाँव के रहवासी ही करेंगे तो इनके बनने में सहयोग भी गाँव के निवासियों को ही करना पड़ेगा और उनका रख रखाव व देख रेख की जिम्मेदारी भी ग्राम वासियों की ही होती है।
शहरों की तुलना में गांवों में सुविधाएं बहुत कम होती है फिर भी लोग एकजुटता और भाईचारे से रहते हैं परम्पराओं, सभ्यता के पोषण के साथ साथ आधुनिकता को भी स्वीकार रहे हैं।
गांवों में हमें गरीब और गरीबी की विवशता ज्यादा देखने को मिलती है वजह है सरकारी योजनाओं की जानकारी न होना उसमें रुचि न रखना और ये योजनाएं उन तक न पहुँचना।
कई योजनाएं और सुविधाएं सिर्फ कागजों में ही रह जाती हैं असल लाभार्थी तक पहुँचती ही नहीं।
इन सब योजनाओं में समाज के हर तबके की कमाई का अंश होता है और भोगते हैं सिर्फ कुछ लोग।
चुनाव आने पर डीजल, पेट्रोल और गैस के दाम घटा दिए जाते हैं और अन्य लुभावने स्कीमें आती हैं, मुफ्त खोरी का लालच दिया जाता है। और चुनाव खत्म होते ही थोड़ा-थोड़ा कर सारी जरूरत की चीजों के दाम के बढ़ाकर पहले से काफी ज्यादा कर दिए जाते हैं। मंहगाई दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है उस स्तर से नौकरियां और सुविधायें सरकारे नहीं बढ़ाती।
जिसका असर पिछड़े, गरीब, और मिडिल क्लास पर सबसे ज्यादा पड़ता है और जरूरत की चीज़ों के लिये भी संघर्ष करना पड़ता है।
फ़िल्म सारे जहाँ से मंहगा में संजय मिश्रा का संवाद कि मंहगाई की वजह से कितनी जरूरी चीजें हम से कब छिन गयी पता भी नहीं चला मंहगी सिर्फ चीज़ें नहीं होती बल्कि उसके साथ साथ बहुत कुछ मंहगा हो जाता है रिश्ते- नाते, हंसी और प्यार भी मंहगे हो जाते हैं रिश्तेदारी में जाना और मेहमान का आना सब मंहगा और मुश्किल हो जाता है। मन पसंद चीज़ें खाना पहनना तो दूर की बात है, जरूरतें भी पूरी करना मुश्किल हो जाता है।
मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास परिवार सबसे अधिक संघर्ष करता है जीवन मे अपनी स्थिति बनाये रखने और उस से आगे बढ़ने हेतु इस मंहगाई में वो त्रिशंकु की तरह लटके होते हैं अधर में पीछे जाना नहीं चाहते और आगे बढ़ने का मौके या तो मिलता नहीं या बहुत कम होते हैं एक्का दुक्का कोई पहुंच पाता है अच्छे पोजीशन पर ।
जैसे भारत मे गरीबी, भुखमरी की तस्वीरें हमारे सामने आती हैं वैसे ही विश्व के हर देश में में है अमेरिका, चीन, जापान, ब्रिटेन और पेरिस विकसित देशों में भी है पर बहुत कम है।
गरीबी तो वैसे ही एक अभिशाप है जरूरत भर का कुछ नहीं मिलता न भोजन न कपड़े न मकान इस कुचक्र से निकलना तो बिल्कुल असंभव है कई पीढियां खप जाती हैं।गरीबी हर देश में है कहीं कम तो कहीं ज्यादा, दुनिया के कई देश हैं (बुरुंडी,नाइजर, लाइबेरिया और सोमालिया) जहाँ आज भी 50 से 60 प्रतिशत लोग पेट भर खाना नहीं पाते इसमें ज्यादातर देश अफ्रीका महाद्वीपीय हैं
विश्व की सम्पूर्ण गरीब आबदी का तीसरा हिस्सा भारत मे है जबकि दुनिया के सबसे अमीर देशों की लिस्ट में शामिल है हमारा देश। वजह है बढ़ती असमानता, जनसंख्या और सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार और लूट, हमे सजग और जिम्मेदार बनकर सरकारें चुननी चाहिए जो आम लोगों में से हो और आम लोगों तक पहुंच सके गाँव और पिछड़े इलाकों को जानता और समझता हो।
या फिर कोई भी नेता हो सरकार हो उसे मजबूर करना होगा आधारभूत सुविधाओं और जरूरतों को पूरा करने के लिए
ऐसी योजनाएँ चलाई जाएं जो गरीबी और भुखमरी को खत्म करें और पहले से चल रही ऐसी योजनाओं का संचालन और क्रियान्वयन पूरे समर्पण,पारदर्शिता और ईमानदारी से हो जिससे समाज के वंचित लोगों को मुख्यधारा में लाया जा सके।
देश दुनिया भर में कृषि आधार है जीवन का। भारत में लगभग 50 प्रतिशत लोग कृषि में लगे हैं लगभग 40 प्रतिशत किसान हैं।
फल, दूध, सब्जियां, दालें व अनाज सब कृषि से आते हैं।
पूरे विश्व का भरण पोषण किसान करता है।
कृषि और कृषि सम्बंधित क्षेत्र में हजारों कंपनियां काम कर रही हैं, फल-फूल रही हैं
भारत मे पिछले 1 दशक में 85-90 स्टार्टअप यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो चुके हैं। जिसमें ज्यादातर कंपनियां IT और एग्रीकल्चर से सम्बंधित हैं।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2017 से 2021 के बीच देशभर में कुल 28,572 किसानों ने आत्महत्या की है. जिसमें सबसे ज्यादा मौतें महाराष्ट्र में हुईं, जहां इसी अवधि में 12,552 किसानों ने आत्महत्या की है।
जब फसल आती है तब भाव बहुत कम मिलते हैं और ऑफ सीजन में भाव बढ़ जाते जाते हैं देश मे सार्वजनिक स्टोरेज व सार्वजनिक कोल्ड स्टोरेज की उपलब्धता न के बराबर है और कृषि में उपयोग होने वाले साधन और इनपुट इतने महंगे कि किसान फसल उगते और कटते ही बेचकर परिवार का खर्च चलाने और कर्ज उतारने में लग जाता है। और फसल की उचित कीमत नहीं मिल पाती। किसान को मिलने वाली सब्सिडीज और अन्य सुविधाओं का अधिकारी और नेता बंदरबांट करते हैं।
किसान क्रेडिट कार्ड और दूसरे स्कीमो में भी किसान को ठगा जाता है। दूसरों का पेट भरने वाला किसान कई बार भूखे सो जाता है बच्चों के फीस समय पर नहीं भर पाता, बच्चों के लिए अच्छे कपडे और खिलौने नही खरीद पाता। अगर मौसम खराब हो ज्यादा बारिश हो जाये या सूखा पड़ जाए तो किसान को खुद खाने के लिए अनाज नहीं होते और न ही परिवार का खर्च चलाने के लिए पैसे ऐसे में किसान कर्ज कैसे भरेगा ऊपर से बार बार कर्ज वसूली की धमकियां इन सब से तंग आकर आत्म हत्या करना ही अंतिम उपाय नजर आता है।
किसी के साथ गलत हो रहा हो, कोई किसी को पीट रहा हो छेड़ रहा हो तो वहां मौजूद लोग वीडियो बनाते हैं किसी हाइवे पर कोई दुर्घटना होती है तो लोग इगनोर कर के चले जाते हैं या फिर वीडियो बनाकर सोशल साइट्स पर पोस्ट कर देते हैं
अगर वहाँ मौजूद लोग सही समय पर सक्रिय रहे और समय पर हॉस्पिटल पहुंचाए तो ऐसे कई दुर्घटनाओं में लोगों की जान बचाई जा सकती है। आप मदद नहीं कर सकते तो आसपास के लोगों को बुलाएं अन्य लोगों की मदद ले एम्बुलेंस और पुलिस को कॉल कर के दुर्घटनाग्रस्त जगह पर बुला लें ऐसा करना हमें जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाता है किसी की जान बचाने और अन्य लोगों को भी सजग और जिम्मेदार बनाता है किसी का जीवन बचाना किसी के काम आना ही जीवन है यह हमें अंदर से ख़ुसी देता है और ऊर्जा से भर देता है।
देश-विदेश में और हमारे आस पास भी ऐसे बहुत सारे एनजीवो और संस्थाए हैं जो विविध विषयों और समस्याओं पर काम कर रही हैं और पिछड़े, गरीब, कमजोर, दिव्यांग, अनाथ और असहाय लोगों के हित और विकास के लिए कार्यरत हैं।
बहुत सारे लोग, गरीबी, जातिवाद, भेदभाव को दूर करने के नाम पर पिछड़ों को हक़ दिलाने के नाम पर उनके विधाता बने बैठे हैं और खुद मंहगी गाड़ियों और बड़े-बड़े घरों के मालिक बने बैठे हैं। हजारों रुपये रोज का खर्च है।
कुछ लोग ही होते हैं जो ईमादारी और समर्पण से कार्य करते हैं। इन्ही अच्छे बुरे के संतुलन से संसार चल रहा है बुराई इतनी व्यापक नहीं हुई अभी अच्छाई भारी है अभी बुराई पर।
दुर्जनों की दुर्बलता से समाज को उतना नुकसान नहीं होता जितना कि सज्जनों की निष्क्रियता से होता है।
सरकारें और पार्टियां सिर्फ लुभावने मनीफेस्टो बनाती हैं उसे पूरा किसी भी कार्यकाल में नहीं करती तमाम योजनाएं सिर्फ पैसे निकालने और खुद पर व पार्टी पर खर्च करने के तरीक़े होते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, पावर, पानी, हेल्थ और एजुकेशन पर भी जरूरत के अनुरूप कार्य नहीं होता, गरीबी और भुखमरी मिटाने की योजनाओं से भी पार्टियां और नेता खुद के बड़े पेट भरने में लगे रहते हैं अगर कुछ अच्छे, सजग व सक्रिय नेता और ब्यूरोक्रेट्स अच्छा करते हैं तो उन्हें करने नहीं दिया जाता।
आज दुनिया मे स्ट्रेस, और एंजोईटी हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं। हमारी महत्वाकांक्षाएँ और लालच बढ़ते ही जा रहे हैं। कामयाबी, अमीरी और प्रसिद्धि की ऐसी होड़ लगी है। कि सही गलत का खयाल ही नहीं आता, संस्कार और भावनाओं को जगह ही नहीं मिल पाती।
हम और आप जैसे ही सफल होते हैं बड़ा पद व प्रतिष्ठा मिलने पर भेद भाव करने लगते हैं और अपना क्लास बना लेते हैं, हमारे अधीनस्थ लोगों से दुर्व्यवहार करने से नहीं चूकते हमारी इच्छाएं बढ़ती ही जाती हैं, इतना कुछ होते हुए भी अपने से कमजोर और जरूरत मंदो के हिस्से को भी झपटने से नहीं चूकते।
“पूत सपूत तो क्यों धन संचय पूत कुपूत तो क्यों धन संचय” जिन संतानों के लिए किसी का हक छीनकर या मेहनत और ईमानदारी से धन का संचय कर रहे हैं अगर उसे अच्छे संस्कार दे और काबिल बनाए तो वो स्वयं कमा लेगा और सफल होगें और यदि वो कुपुत्र है अर्थात काबिल और संस्कारी नहीं तो हमारे संचय किये हुए धन को व्यसनों और मौज मस्ती में उड़ा देगें और हमारा किया हुआ धन बेकार जाएगा ।
हम सब को पता है एक दिन सब को सबकुछ छोड़ कर जाना है खाली हाथ जाना है हमारे अच्छे कर्म ही रहेंगे और शादियों तक याद किये जायेंगे ।
-श्याम नन्दन पाण्डेय
मनकापुर, गोण्डा, उत्तर प्रदेश