अब कहां खडे़ हैं सचिन पायलट ?

जयपुर | राजस्थान कांग्रेस में अब धीरे धीरे स्थिति साफ होने लगी है, कहा जा रहा है कि कांग्रेस अब एकजुट होकर चुनाव लडेगी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जैसा कहा जा रहा है, वैसा ही है ? क्या सचिन पायलट अब लायक हो गए हैं या उनकी घिसाई पूरी हो गई है? क्या पेपर लीक मामले में जिन लोगों पर कार्यवाही वांछित थी, वह पूरी हो गई है? क्या सचिन पायलट के जिन समर्थक विधायकों ने कथित तौर पर गद्दारी की थी वो अब पार्टी के प्रति अनंत निष्ठा में बदल चुकी है? क्या प्रदेश के युवाओं को मिले धोखे को अब न्याय मिल गया है? या राज्य कर्मचारी चयन आयोग को लेकर पायलट द्वारा उठाई गई शंकाओं का समाधान कर दिया गया है?

राजनीति का एक प्रबल सिद्धांत है कि जो होता है, वह दिखता नहीं है और जो दिख रहा है, वैसा होता नहीं है। राजनीति में कुछ भी स्पष्ट रूप से काला या सफेद नहीं होता है । इन सब सिद्धांतों के बावजूद राजस्थान और कांग्रेस की राजनीति के जानकार यह मानते हैं कि सचिन पायलट ने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए गहलोत के आगे समर्पण कर दिया है। अपनी अलग पार्टी बनाने की गीदड़ भभकी देने की हद तक गए पायलट अब कांग्रेस में अस्तित्व की लडाई लड़ रहे हैं।

पिछले तीन साल के घटनाक्रम पर निगाह फिरायें तो यह समझ में आता है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को राजनीति की रपटीली राहों पर खूब फिसलाया या यूं कहना चाहिए कि खड़ा ही नहीं होने दिया, और वर्तमान परिस्थिति में घुटनों पर लाकर छोड़ दिया। अब देखना सिर्फ इतना है कि आगामी विधानसभा चुनावों में पायलट अपने कितने समर्थकों को पहले टिकिट दिला पाते हैं और फिर उनमें से भी कितनों को जिता पाते हैं।

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पायलट के लिए यह सब किसी भी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। जहां एक तरफ उनके समर्थक विधायकों में गहरी निराशा है, वहीं दूसरी तरफ गूर्जर समाज भी अपने आपको ठगा हुआ सा महसूस कर रहा है। जिन जिन विधायकों ने पायलट के साथ खडे़ होने का दम दिखाया था, उनके क्षेत्र में सरकार की तरफ से बेरूखी होने के कारण वो विकास के अवसरों से वंचित रह गए, उन क्षेत्रों को सरकारी योजनाओं का उतना लाभ भी नहीं मिला, जितना एक कांग्रेस विधायक होने के कारण मिलना चाहिए था, उपर से प्रशासन के असहयोगी व्यवहार ने मुश्किलें पैदा कर उन विधायकों के प्रति जनमानस में नकारात्मकता ही पैदा की है। इस बात का दुष्प्रभाव भी पायलट समर्थकों को सहन करना होगा।

राजस्थान की दो सौ विधानसभाओं में से 23-24 सीटें ऐसी हैं जिनपर गूर्जर मतदाताओं का गहरा असर है, जहां वह किसी प्रत्याशी के भाग्य का फैसला कर सकते हैं। इस लिहाज से नसीराबाद, थानागाजी, बांदीकुई, बानसूर, नगर, कामा, बाड़ी, टोडाभीम, सपोटरा, कोटपूतली, जमवारामगढ़, विराट नगर, देवली-उनियारा, निवाई, खंडार, गंगापुर, पीपल्दा, हिंडोली, केषोरायपाटन, खानपुर, मनोहरथाना, खेतड़ी, मांडल और आसींद ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर गूजर समाज का मतदाता प्रभावी है। लेकिन पिछले दिनों भाजपा नेता प्रहलाद गुंजल ने कोटा में जो शक्ति प्रदर्शन किया था, उसमें डेढ़ लाख से अधिक गूजर सम्मिलित हुए थे। इतनी बड़ी संख्या में गूजरों का एक जगह आना भी सचिन पायलट से मोह भंग होने की आहट दे रहा है। इसी प्रकार अजमेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा में भी गुर्जरों ने बढ़ चढ कर हिस्सा लिया था। यह भी गुर्जरों के बदलते रुख़ को परिभाषित कर रहा है।

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तो कुल मिलाकर यह तो स्पष्ट है कि सचिन पायलट अपने जीवन के पहले राजनीतिक बवंडर में फंस चुके हैं, यदि कांग्रेस राजस्थान का चुनाव हारती है तो इसका ठीकरा सचिन पायलट के सिर पर फोड़ा जाएगा और यदि जीत जाती है तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की ना केवल जादुगरी मानी जाएगी बल्कि वे कांग्रेस और यू पी ए में भी बडे़ चमत्कारिक नेता के रूप में उभरेंगें।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी, जयपुर
सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट

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