नाई हो तो जगबदन ठाकुर जैसा
गोरखपुर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष व हिंदुस्तान के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार राय के फेसबुक वॉल से लिया गया यह लेख ग्रामीण अंचल की चार दशक पूर्व के आचार, विचार, व्यवहार को प्रदर्शित करता है।
बाल बाराती और जगबदन ठाकुर
अरविन्द कुमार राय
मुख्य संवाददाता, हिन्दुस्तान
बांसगांव तहसील क्षेत्र का एक गांव है महुजा। गांव के जगबदन ठाकुर। इनकी मौत हुए तकरीबन तीन दशक गुजर गए। पर जगबदन ठाकुर आज भी गांव के लोगों के दिल-व-दिमाग में रचे-बसे हैं। उनमें कुछ खासियतें थीं जिनकी चर्चाएं गांव में होने वाले हर सामूहिक, पारम्परिक और धार्मिक अनुष्ठानों में न चाहते हुए भी शुरू हो जाती हैं। खास कर तब जब गांव से कोई बारात जा रही होती है। वजह आज गांव में कोई ‘जानकार और जिम्मेदार नाई’ नहीं रह गया है। जानकार जो रीति-रिवाज और धर्म-कर्म की अच्छी समझ रखता हो। जिम्मेदार जो पूरे गांव को अपना परिवार मानता हो। जगबदन ठाकुर में कई खास गुणों के साथ ही ये दोनों गुण भी कूट-कूटकर भरे थे। गांव में किसी परिवार में शादी होती थी तो जगबदन ठाकुर उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। परिवारीजन लापरवाही भले कर जाएं लेकिन जगबदन कभी चूक नहीं होने देते थे। जिस दिन बारात जानी होती थी उस दिन जगबदन ठाकुर विशेष भूमिका में आ जाते थे। सुबह ही वह पूरे गांव में फेरी लगा देते थे। हर घर का दरवाजा खटखटाकर पूछ लेते थे कि उनके परिवार से कोई बच्चा तो बारात नहीं जाएगा! गांव में कई परिवार ऐसे हैं जिनके यहां पुरुष सदस्य कमाने चले गए हैं, घर पर बच्चे और महिलाएं रहती हैं। ऐसे घरों के लोग जगबदन को बता देते थे कि उनका मासूम बेटा ही आजा बाराती है। जगबदन ठाकुर की जुबान परयह बात दर्ज हो जाती था कि किन-किन घरों से बच्चे बाराती हैं। सुबह 10 बजते-बजते वह विवाह वाले घर पहुंच जाते थे। कुंअरथ उतरने से पहले ही पूछ लेते थे कि खाना पक गया है। हां होने पर वह बारात जाने की तैयारी कर रहे सभी बच्चों को उनके घर से बुला ले आते थे। उन्हें एक साथ बैठाकर खाना खिला देते थे। बच्चों को हिदायत देकर भेजते थे कि घर जाकर वे लोग कुछ देर सो लें। दोपहर बाद 3 बजे वे सभी लोग कपड़े पहनकर गांव के बाहर बागीचे में पहुंच जाएं।
बच्चों से फुर्सत पाने के बाद जगबदन ठाकुर हर रस्म-रिवाज पूरी कराते थे। दोपहर में खुद खाना खाते थे और फिर विवाह वाले घर के मुखिया से लड्डू मांगकर गमछे में गठिया लेते थे। दोपहर में धर जाकर वह कुछ देर आराम करते थे। नींद खुलने पर नहा-धोकर तैयार हो जाते थे और लाठी के पिछले हिस्से में डाल-मऊर बांधकर कंधे पर लटकाए बागीचे में पहुंच जाते थे। बाल बाराती उनका इंतजार ही कर रहे होते थे। एक-एक बच्चे से जगबदन ठाकुर पूछ लेते थे कि किसी को भूख तो नहीं लगी है। कंघे पर डाल-मऊर बंधी लाठी रखे जगबदन ठाकुर आगे-आगे बारात के लिए चल देते थे और पीछे-पीछे सभी बाल बाराती। जगबदन ठाकुर निर्गुण बहुत अच्छा गाते थे।…के तोहरे संग जाई भंवरवा, के तोहरे संग जाई…। इस निर्गुण को जब वह आवाज देते थे तो पैदल चल रहे बाल बारातियों की थकान स्वत: गायब होती जाती थी। दुल्हन का गांव कुछ फासले पर रह जाता था तो जगबदन ठाकुर सभी बाल बारातियों को रोक देते थे। यह ध्यान रखते थे कि वहां हैंडपम्प हो और जगह छायादार। वह खुद हैंडपम्प चलाते थे और बाल बारातियों का एक-एक कर मुंह धुलवाते थे। इसके बाद सभी को एक-एक लड्डू खिलाते थे और जमकर पानी पिलाते थे। फिर जगबदन ठाकुर अपनी क्लास लगाते थे। सभी बाल बारातियों को हिदायत देते थे कि वह जहां बताएंगे हर कोई वहीं रहेगा। इधर-उधर नहीं जाएगा।
बारात पहुंच जाने के बाद जगबदन ठाकुर सभी बाल बारातियों के लिए स्कूल या पंचायत भवन का एक कमरा आरक्षित कर लेते थे। सभी के लिए उसी कमरे में दरी डलवा देते थे। जैसे ही 7 बजता था, द्वारपूजा हुआ या नहीं, जगबदन ठाकुर लड़की वाले के घर पहुंच जाते थे। लड़की वालों से पूड़ी-सब्जी मांगकर उठा ले आते थे और बाल बारातियों को खिला देते थे। यह कहकर फिर वह रस्में पूरी कराने में जुट जाते थे कि रात में जब बाराती खाना-खाने जाएं तो वे भी चलें। अधिकतर बाल बाराती सो जाते थे लेकिन जो जाग रहा होता था, जगबदन ठाकुर उसे साथ लेकर जाते थे। अपने साथ ही खिलाते थे और फिर ले आकर कमरे में सुला देते थे। रात में वह खुद कमरे के दरवाजे पर पहरा देते थे। यदि बारात में कोई विवाद हो जाता था तो वह किसी को बाल बारातियों वाले कमरे के अंदर नहीं जाने देते थे। सुबह वह बाल बारातियों को जगाकर नित्य कर्म कराते थे और 10 बजते-बजते लड़की वाले के घर धमक जाते थे। बसिया पूड़ी-सब्जी मांगकर ले आते थे और बच्चों को खिला देते थे। दोपहर में भूजा-रस और फिर भोजन। रात में भी वही क्रम। मड़वाना होने के बाद जब बारात विदा होने लगती थी तो जगबदन ठाकुर फिर लड़की वाले के घर से लड्डू मांग ले आते थे। गमछे में गठियाने के बाद बाल बारातियों की टोली लेकर घर के लिए चल देते थे। रास्ते में फिर एक पड़ाव होता जहां बच्चे लड्डू खाते और जमकर पानी पीते। बारातियों के पहुंचने में देर हो जाए तो भी गांव का हर कोई आश्वस्त होता था। जगबदन ठाकुर हैं तो बच्चे सुरक्षित होंगे। बच्चे भूखे भी नहीं रहेंगे।
दशहरा के दौरान होने वाली रामलीला में जगबदन ठाकुमर 56 खाने के रिंच की तरह होते थे। छोटा-मोटा अभिनय तो कर ही लेते थे जरूरत पड़ने पर ढोलक और नक्कारा भी बजा लेते थे। होली के दिन तो जगबदन ठाकुर का नाम हर जुबां पर रहता था। वह फाग जमकर गाते थे और झाल खूब बजाते थे। दीपावली के दिन तो उनका रूप ही बदल जाता था। वह हर दरवाजे पर पहुंचते थे। छोटे-बड़े हर व्यक्ति के सामने हाथ जोड़े खड़े हो जाते थे….बाबू जगबदन आया है। जगबदन के ये गुण ही थे कि वह गांव के हर व्यक्ति के दिल में बसते थे। उन्हें बुखार हुआ तो एक-दो नहीं दर्जन भर लोग पहुंच जाते थे। जगबदन ठाकुर किसी के घर जाकर कुछ भी मांग लेते थे। किसी के घर बैठकर खा लेते थे। जगबदन का सीना तब तन जाता था जब गेहूं की कटाई हो या धान की मड़ाई। गांव के छोटे-मोटे किसानों के खेतों में हुई पैदावर से अधिक उनके घर ‘जवरा’ का धान-गेहूं जमा हो जाता था। दूध-दही तो वह रोज खाते थे। उन्हें देखकर लोग कद्दू-लौकी और नेनुआ भी थमा देते थे। जगबदन खुश रहते थे और हर वक्त सभी को खुश रखना चाहते थे। जगबदन ठाकुर से रविवार के दिन बच्चे बचना चाहते थे। वह बच्चों के बाल खूब छोटा काट देते थे। कोई ऐतराज करता था तो केवल इतना कहते थे, बाल न बढ़ाओ बाबू, खूब खाओ-पीओ ताकि गर्दन मोटी रहे। जो देखेगा देखता रह जाएगा।