ज्योतिष के दो ध्रुव
ज्योतिषाचार्य पंडित भरत भूषण पाण्डेय का नवग्रहों पर अपनी विचारधारा
ज्योतिष में हम नौ ग्रहों का जातक के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है इसका अध्ययन करते हैं, ज्योतिष सीखने में रुचि रखने वाले व्यक्तियों को “ज्योतिष के दो ध्रुवों” को समझना चाहिए
ज्योतिष के अध्ययन के दौरान मैंने पाया की अगर आप थोड़ा बारीकी से ग्रहों का उनके स्वभाव का अध्ययन करेंगे तो पायेंगे की नौ ग्रहों का स्वभाव एक दूसरे से एकदम विपरीत है, इस बारीकी को समझने में अगर आप कामयाब रहे तो फिर कम से कम किसी कुंडली का फलादेश करते समय में उतनी मुश्किलें आपको नहीं होंगी
सूर्य देव जिस तरह दिन का प्रतीक है अनुशासनप्रिय हैं वहीं चंद्रमा रात्रि का प्रतीक हैं कलात्मक हैं, इन दोनों के बाकी गुण भी एकदम विपरीत हैं जैसे सूर्य देव में ऊष्मा है चंद्रमा में शीतलता है
मंगल जिस तरह ऊर्जा है, रणनीतिज्ञ है और सकारात्मक है ठीक उसी तरह केतु भी ऊर्जा है लेकिन उसके पास अपनी कोई रणनीति नहीं है जिसके साथ होता है उसकी रणनीति पर अमल करने लगता है तो केतु की ऊर्जा विध्वंशक है
बुध जिस तरह वाकपटु है उसी तरह राहु चालाक है और कुछ हद तक धूर्त भी, बुध की वाकपटुता अपना काम निकलवाने के लिए है लेकिन बुध ये भी ख्याल रखेगा की किसी का कोई नुकसान ना हो मगर राहु को सिर्फ अपना फायदा दिखेगा उसे किसी दूसरे के नुकसान से कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा
ब्रहस्पति जहां देव गुरु हैं हैं उसके विपरीत शुक्र दैत्यों के गुरु हैं ब्रहस्पति जातक को आध्यात्मिक चेतना देते हैं वहीं शुक्र का स्वभाव भौतिक वादी है, गुरु जहां अपने ज्ञान के दम पर पहुंचेंगे शुक्र वहां पर पैसों के दम पर या प्रभाव के दम पर पहुंचेंगे, उदाहरण के लिए किसी धार्मिक कार्यक्रम में देश/राज्य/शहर के राजा (शुक्र) और उस अनुष्ठान को पूर्ण करवाने वाले पंडित जी (गुरु) का एक ही जगह पर होना
राहु दुनिया वाला छोर है जिसकी सारी यात्राएं बाहरी हैं केतू मोक्ष वाला छोर है जिसकी सारी यात्राएं आंतरिक हैं
बुध मस्तिष्क है तार्किक है वहीं चंद्रमा मन है कल्पनाओं से भरा हुआ है इसलिए जब दोनों साथ बैठते हैं तो जातक को निर्णय लेने में दिक्कत होती है
शुक्र भोग, विलास है बाहरी सुंदरता है गुरु ज्ञान, चेतना और आंतरिक सुंदरता है, इसलिए ये दो भी जब साथ होते हैं तो जातक धर्म और काम के मध्य सामंजस्य स्थापित करने के लिए संघर्ष करता है और इसी संघर्ष में जीवन बिता देता है
शनि कर्म प्रधान हैं गुरु धर्म प्रधान हैं एक तरह से कह सकते हैं गुरु भाग्यवादी हैं और कहते हैं जो भाग्य में होगा उसे स्वीकार कर लेंगे और शनि का कहना है मैं अपने हाथों की रेखाओं का निर्माण अपने पुरुषार्थ के दम पर स्वयं करूंगा‼️
- ज्योतिषाचार्य पंडित भरत भूषण पाण्डेय