ग़ज़ल – दामन में मेरे दाग़ लगाना नहीं भूले

दामन में मेरे दाग़ लगाना नहीं भूले
क़दमों तले वो ख़ार बिछाना नहीं भूले

तुम इश्क की तासीर से महरूम रहोगे
गर ख़ूँ से कभी प्यास बुझाना नहीं भूले

वो लौट के तो आ गए पर दिल है परेशां
मन्दिर अभी आँखों में खज़ाना नहीं भूले

सपनों का सदा क़त्ल हुआ आँख में लेकिन
आँखों में कभी सपने समाना नहीं भूले

 

बलजीत सिंह बेनाम

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