अनोखा मंदिर जहां जमीन में 100 फिट से अधिक धंसा है हनुमान जी का एक पैर
- यूपी के सुल्तानपुर में इसी स्थान पर हनुमान जी ने कालनेमि राक्षस का वध किया था
- बजरंगबली के दर्शन और मकरी कुंड के स्नान से दूर हो जाते हैं सारे कष्ट, होती है हर मन्नत पूरी
- यहां ज़मीन में धंसा है हनुमान जी का एक पैर, थोड़ी तिरछी है मूर्ति
आनंद उपाध्याय | यूं तो हनुमान जी के मंदिर देशभर में कई है और सभी मंदिरों में हनुमान जी की प्रतिमा कुछ अनोखी है। हिंदुओं का हर धाम और मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र रहा है। लोग अक्सर अपनी मनोकामना पूरी करवाने मंदिर जाते हैं। कई सिद्ध मंदिर हैं जहां जाने मात्र से बिगड़े काम बन जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद में हैं । मंदिर का नाम है विजेथुवा महावीरन धाम, जो बड़ी आस्था का केंद्र है। यहां सावन माह के नागपंचमी के बाद पड़ने वाले मंगलवार को बड़का मंगलवार, दूसरे मंगलवार को बुढ़वा मंगल व तीसरे मंगलवार को छोटका मंगलवार के रूप में मनाया जाता है। इसमें जनपद ही नहीं वरन् अन्य प्रदेशों से श्रद्धालु दर्शन पूजन करने। यहां सरोवर ‘मकरी कुंड’ में स्नान करने से सारे पाप धूल जाते हैं।
कादीपुर तहसील में विजेथुवा महावीरन नाम से हनुमान जी का यह मंदिर रामभक्ति और वीरता का प्रतीक है। मंदिर में स्थित हनुमान जी की मूर्ती इस मंदिर की प्राचीनता का प्रमाण है। मूर्ति का एक पैर जमीन में धंसा हुआ है, जिसकी वजह से मूर्ति थोड़ी तिरछी है। पुरातत्व विभाग ने मूर्ति की प्राचीनता जांचने और पुजारियों ने मूर्ति को सीधा करने के लिए उसकी खुदाई शुरू कराई। लेकिन 100 फिट से अधिक खुदाई कराने के बाद भी मूर्ति के पैर का दूसरा सिरा नही मिला था और खुदाई वहीं रोक दी गई थी ।
यहाँ है यह मंदिर
जिला मुख्यालय से 48 किलोमीटर पूरब लखनऊ-बलिया राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 36 के किनारे स्थित सूरापुर कस्बे से 2 किलोमीटर दक्षिण बिजेथुआ महावीरन सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक एवं पौराणिक धर्म स्थली है। जो लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यह पौराणिक स्थल आजमगढ़, अंबेडकर नगर तथा प्रतापगढ़ जनपद की सीमाओं से आवृत्त है।
रामायण में भी है मंदिर का उल्लेख
‘मुनि न होई यह निशिचर घोरा, मानहूं सत्य वचन की कपि मोरा’
प्राचीन धर्म ग्रंथ रामायण में भी विजेथुवा महावीरन धाम का जिक्र मिलता है। मान्यता है कि जब श्रीराम और रावण के बीच चल रहे युद्ध में लक्ष्मण जी को शक्ति बाण लगा और वो मूर्छित हो गए तो वैद्यराज सुषेण के कहने पर हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए हिमालय की तरफ चले। हनुमान जी संजीवनी बूटी को लेकर न आ पाये इसके लिए रावण ने मायावी राक्षस कालनेमि को भेजा था । मायावी कालनेमि सन्यासी का वेश धारण कर रास्ते में राम-राम का जाप करना शुरू कर दिया। थके-हारे हनुमान जी राम-राम धुन सुन कर वहीं रुक गए। रामायण के अनुसार साधू के वेश में कालनेमि ने हनुमान जी से उनके आश्रम में रुक कर आराम करने का आग्रह किया। हनुमान जी उसकी बात में आ गए और उसके आश्रम में चले गए। उसने हनुमान जी से आग्रह किया कि वह पहले स्नान कर लें उसके बाद भोजन की व्यवस्था की जाए। हनुमान जी स्नान के लिए तालाब में गए जहां कालनेमि ने मगरमच्छ बनकर हनुमान जी पर हमला किया था।