लछुमी मजदूर
लछुमि भाई हमारे गांव के रहने वाले हैं, हालांकि गांव के बाहर बसा दूसरे टोले पर घर है उनका परन्तु शायद ही कोई ऐसा होगा जिनसे उनका परिचय न हो, मजदूरी काम है उनका लेकिन उनकी रुचि केवल लेंटर लगने वाले काम में ही ज्यादा है।
इसका कारण भी अभी बताऊंगा पहले कुछ उनकी शरीरिक संरचना के बारे में बताते हैं। अंधेरे में अदृश्य हो जाने लायक श्याम रंग और पूरा 6 फ़ीट की लंबाई है लछुमी भाई का , आगे के पीले और एक दूसरे से बराबर सोशल डिस्टनसिंग बनाये हुए दोनों दांत उनके काले मसूड़ों से ऐसे बाहर निकले हुए हैं जैसे उनके आगे चलने के लिए रास्ता बनाने का कार्य उनके जिम्मे हो। काले अजगर की भांति उनके कंधे से लटकी दो लम्बी लम्बी सुडौल बांहे उनके मेहनत कश होने का परिचायक हैं, धूप सोख कर हुए आधे काले आधे सफेद बाल उनके मजदूरी की परिभाषा को पूर्ण कर रहे हैं,लेकिन माथे पर बंधा लाल गमछा उनके कर्म के लिए सदा ही उद्दत होने का परिचायक भी है। अपने बगल में दो सीमेंट की बोरी और 2 सिर पर लाद कर दो मंजिल चढ़ जाने वाले पूरे गांव में एकमात्र मजदूर हैं जिसको देख कर गांव के गिरमिटिया लोग दांत चियार दें।
लेकिन लछुमी भाई की एक कमी भी है ,वह खाने के मामले में भी उतने ही वीर हैं जितने काम करने में, और ये बात केवल उसे पता है जो भुक्तभोगी है, और शायद अब पूरा गांव जानता है । वह खाने में बिल्कुल ही शर्म नही करते ,न ही जात पात देखते ,भोज किसी के यहां भी हो, बुलाये हो या न बुलाये हों ,बिल्कुल शर्माते नही। मनुवादियों से विशेष लगाव है उनको , बाभन के बच्चे को भी हाथ जोड़ कर कहते ‘परनाम बाबा’ और बच्चे लछुमी भाई ,लछुमी भाई बोलते ।
बाभन बालक अगर कभी देखें कि लछुमी नजरअंदाज किये चला जा रहा है तो दौड़ के सामने जाकर कहते ,का लछुमी भाई का हाल है?
वो बोलते ‘परनाम बाबा’ सब ठीक है आप बताइए…बाभन बालक तो खाली परनाम बाबा सुनकर आत्ममुग्ध हुए फिरते।
जिस प्रकार विरह अग्नि में जलते कुँवारे युवा और युवतियों को लग्न का इंतजार रहता है ठीक वैसे ही लछुमी की जठराग्नि भी लगन का मौसम आने का इंतजार करती रहती।
लछुमी के किस्से तो कई सुनने को मिल जाएंगे लेकिन ये किस्सा मैं आज तक भूल नहीं पाया हूँ।
कहीं किसी बारात में ड्राइवर के खलासी बन के लछुमी भाई जठराग्नि शान्त करने गए हुए थे हालांकि बारात किसी बड़े आदमी की थी तो वहां मांसाहार की व्यवस्था नहीं थी तो दो ड्राइवरों ने सोचा कि खेत में ही मीट बनाया जाय बाकी आइटम बारात में से मंगा लिया जाएगा,लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल थी कि साथ में लछुमी था ।
फिर दोनो ड्राइवरों ने खेल खेला , एक ड्राइवर मीट लेने चला गया , तो दूसरे ने कहा “लछुमी लगता है मनोजवा बारात में खाने गया तू भी जा खा ले मैं जरा रुकता हूँ गाड़ी के पास”
भोले भाले लछुमी को क्या पता यहाँ मीट पार्टी होने वाली है ,भूख तो लगी आ रही थी लछुमी तुरंत छूटे तीर की मानिंद खाने के स्टाल की तरफ बढ़ गया, और इधर ड्राइवर हंडिया और गोइठा का जुगाड़ करने निकल लिया।
ठीक एक घंटे बाद लछुमी उधर से डकार मारते और पेट पर हाथ फेरते लौटा औऱ सीधे गाड़ी के पास गया वहां सुरेश को न पाकर पूछा ‘मनोज भैया ये सुरेश कहाँ गया?’
मनोज ने मीट और मसाले प्याज की काली पन्नी छुपाते हुए कहा ” खाने निकल गया होगा, तुम खा लिए क्या?”
लछुमी पेट पर हाथ फेर कर बोला “हाँ भैया बड़ा ही स्वादिष्ट भोजन था, अब तो हमसे हिला भी नहीं जाता, बहुत खा लिया हूँ अब मैं सोऊंगा”
मनोज ने चमकती आंखों से खुश होकर कहा “अरे तुमने खाना खा लिया , हम तो बाजार से मीट लाये थे पकाने के लिये, चलो तुम भी थोड़ा खा लेना ”
लछुमी ने कहा “नहीं भैया, अब हम तो तिनका मुंह में न डालें”
है है है है करते हुए मनोज ने कहा कोई बात नहीं हम और सुरेश खा लेंगे।
तब तक सुरेश हंडिया , गोइठा के साथ साथ अद्धा बोतल भी ले आया और लछुमी फोल्डिंग पर खुले आसमान तले पसर गया ।
आग जलाई गई और उस पर मीट वाली हंडिया चढ़ा दी गई ,दोनों ड्राइवर मीट पकाते जाते और बतिया बतिया के हंसते जाते कि कैसे लछुमी को दिमाग से किनारे कर दिए, उधर खाट पर पसरा लछुमी सोचता कि “काश आते समय जो बारह गुलाबजामुन न खाए होते तो थोड़ा मीट तो चख ही लेते , और किस्मत को कोसता कि कभी कभी रोटी भी भरपेट मिलनी मुश्किल हो जाती है और आज देखो सब कुछ है लेकिन जगह नहीं है।”
जनवासे में आर्केस्ट्रा चालू हो गया था , ये देखकर एक ड्राइवर बोला चलते है एक दो गाना देख कर आएंगे तब तक पक भी जाएगा,लछुमी खा भी चुका था तो उससे कोई भय भी नहीं था।
मनोज बोला, “लछुमी आर्केस्ट्रा देखने चलेगा?”
लछुमी बोला, ” मैं कहीं नहीं जाऊंगा , मुझसे हिला नहीं जा रहा”
सुरेश ने कहा, ” ठीक है ये मीट देखते रहना , बीच बीच मे चलाते रहना ”
लछुमी ने अनमने ढंग से कहा “ठीक है जाओ ,जल्दी आना”
दोनों ड्राइवर चल दिये, एक नए कहा धीमी आंच में देर तक हँड़िये में पका मीट बहुत स्वादिष्ट होता है , दूसरे ने कहा हाँ सही कहते हो भाई हमने भी एक बार बनाया था गांव पर , बहुत मजेदार हुआ था।
इधर उन दोनों के जाने के बहुत देर बाद भी लछुमी पसरा रहा फिर इस खयाल से कि कोई जानवर पलट न दे हंडिया, उठ गया और जाकर हँड़िये के पास बैठ गया, पेट दबने की वजह से उसे एक बार महसूस हुआ कि अभी अंदर का माल मुंह के रास्ते बाहर आ जायेगा, फिर उठ गया और फोल्डिंग को हँड़िये के पास घसीट लाया और लकड़ी से हंडिया के अंदर रखे मीट को चलाने लगा तब तक उसमें से निकली भाप उसके नथुनों में गई उसने सोचा लगता है पक गया, पर रोशनी पर्याप्त न होने कि वजह से उसे निर्णय लेना कठिन हो रहा था सो मजबूरन उसे एक पीस निकालना पड़ा , उसने बमुश्किल निकाला और फोल्डिंग पर रख दिया,फूंक मारी तो देखा पीस बड़ा था अब क्या करे उठाया और उस गरमा गरम पीस को दांतों से काटा , लगभग पक गया था लेकिन पूरी तरह नहीं। अब जूठी बोटी तो रख नहीं सकता वापस सो गरमा गरम उसे खा गया और सिर झुका कर लकड़ी फिर हँड़िये में चलाने लगा।
उसने हो रहे आर्केस्ट्रा की तरफ नजर मारी कि शायद वो वापस आ रहे हों लेकिन कोई आहट न पाकर उठ खड़ा हुआ और बीड़ी पीने लगा , उसने आराम से बीड़ी खत्म की और हँड़िये की तरफ नजर मारी ,आंच तेज लग रही थी , सोचा थोड़ा ही तो बाकी था पकने में , कहीं जल न जाय यह सोचकर कुछ जलती लकड़ियां निकाल कर आंच कम कर दी और फोल्डिंग पर लेट गया , और आसमान में ताकने लगा लेकिन उसका ध्यान पूरी तरह हांडी पर था कहीं कुछ बिगड़ न जाय क्योंकि जिम्मेदारी उसकी थी ।
अब उसे खीझ आ रही थी ,वह सोना चाहता था लेकिन वो दोनों आर्केस्ट्रा में इतने मशगूल हुए कि समय का ध्यान न रहा इधर लछुमी ने एक बार और चेक करने की सोची , उसने एक पीस और निकाला , फोल्डिंग पर रखा ,फूंक मारी और दांत से काटा……वाह क्या स्वाद था उसका पूरा मुँह पानी से भर गया उसने फटाफट पीस खत्म किया और आग बुझा दी। थोड़ी देर बाद उसने फिर एक पीस निकाला और खा गया , फिर एक पीस ,फिर एक पीस और फिर अब उसे लग रहा था कि उल्टी कर देगा …..लेकिन हंडिया फिर टटोला अब शायद नहीं बचा।
अब वह फोल्डिंग पर आराम से लेट गया , आग बुझ चुकी थी, लेकिन हल्का धुआं अब भी निकल रहा था, हंडिया अब भी गर्म थी लेकिन बिना बोटी के सिरुआ ठंडा हो रहा था, फोल्डिंग के नीचे चूसी हड्डियां बिखरी थीं ..दोनों ड्राइवर अपने दोनों हाथ में पत्तल, गिलास ,पानी की बोतल ,बारात के खाने के आइटम लेकर खड़े हुए लछुमी को गरिया रहे थे ………………ई स्साला मजदूर खाली लेंटर वाला ही काम इसीलिए करता है कि उसके बाद होने वाले भोज से इसकी क्षुधा भर सके।