समय – समय पर प्रकृति ख़ुद चलाती है अपना सफाई अभियान

एम के निल्को | कोरोना संकट के समय जब आदमजात अपने घरों में दुबक गया और प्रकृति मुस्कराने लगी हैं।  पिछले चार महीनों में हमारी दुनिया एकदम बदल गई है। हज़ारों लोगों की जान चली गई, लाखों लोग बीमार पड़े हुए हैं। इन सब पर एक नए कोरोना वायरस (कोविड19) का क़हर टूटा और उसके बाद से दुनिया में बहुत कुछ उलट पुलट हो गया। दरअसल प्रकृति के खुद का सफाई अभियान है ये कोविड -19

समय – समय पर पर पूरी दुनिया में एक बड़ी महामारी का हमला होता है।  जैसे अभी कोरोना वायरस फैला हुआ है, महामारी फैलती चली जाती है, लोगों की मौत होती रहती है। आइये कुछ इतिहास देखते हैं – 1347 से 1351 और फिर 1720 में पूरी दुनिया में प्लेग फैला था। इसे ग्रेट प्लेग ऑफ मार्सिले कहा जाता है। उस समय भी पूरी दुनिया में बहुत जनहानि हुई थी । द लैंसेट’ के मेडिकल जर्नल के मुताबिक, कॉलेरा 1817 से 1923 के बीच 6 बार पूरी दुनिया में फैल गया था तथा एक महामारी का रूप ले लिया था । 1820 में सर्वाधिक मौत कॉलेरा से हुई थी । इस महामारी ने जापान, फारस की खाड़ी के देश, भारत, बैंकॉक, मनीला, जावा, ओमान, चीन, मॉरिशस, सीरिया आदि देशों को अपनी जकड़ में ले लिया था । कुछ इसी तरह 1918 में स्पैनिश फ्लू देखने को मिला तथा 1920 में यह बहुत ही भयानक रूप ले लिया था । कहा जाता है कि इस फ्लू की वजह से पूरी दुनिया में 1.70 करोड़ से 5 करोड़ के बीच लोग मारे गए थे।  कुछ इसी तरह का महामारी का रूप ले रहा है कोरोना वायरस ।

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कोरोना वायरस के संक्रमण से उत्पन्न बीमारी कोविड-19 ने आज मानव जाति के इस विश्वास को पस्त कर दिया है कि हम तो आधुनिक विज्ञान के उस दौर में जी रहे है जहां विज्ञान हमारे समक्ष मौजूद संकटों का कुछ न कुछ समाधान ढूंढ ही लेगा। वह यह भूल जाता है कि प्रकृति की ऐसी हर करवट हमें जागने का संकेत देती है। प्लेग, हैजा, स्पेनिश फ्लू जैसी महामारियों के रूप में प्रकृति ने समय-समय पर हमारे सामने अपने क्रोध का इजहार किया है। इतिहास गवाह है कि इन महामारियों में लाखों लोग काल के ग्रास बने थे।

कोरोना वायरस के संकट ने मनुष्य को उसके विकास के पुनर्मूल्यांकन के दोराहे पर खड़ा कर दिया है। आज हमें विकास के नए मापदंड अपनाने होंगे। कोरोना के बाद नई दुनिया का विकास पर्यावरण संरक्षण के साथ हो, जिससे वन्य प्राणियों के पर्यावास पर विशेष ध्यान दिया जा सके। खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत आने वाले पशु-पक्षियों में संक्रमण न फैले, इसके लिए उनके रखरखाव संबंधी नए कानून बनें एवं जो कानून मौजूद हैं उनका कड़ाई से पालन हो जिससे महामारी फैलने से रोका जा सके। हमें अपनी लाइफ स्टाइल बदलने की सख्त जरूरत है।

मानव का वजूद प्रकृति से है न कि प्रकृति का अस्तित्व मानव से है। इस सच्चाई को जब तक मनुष्य स्वीकार नहीं करेगा, उसकी जीवनशैली में बदलाव भी नहीं होगा। इसके लिए मनुष्य को अधिक संवेदनशील होना होगा और वैश्विक समाज को एकजुट होकर काम करना होगा। साथ ही प्रकृति को अपने एक अंग के रूप में स्वीकार करना होगा। महात्मा गांधी ने कहा था कि पृथ्वी हर मनुष्य की जरूरत को पूरा कर सकती है, परंतु पृथ्वी मनुष्य के लालच को पूरा नहीं कर सकती है। कोरोना का संकट आज हमें इस सीख को अपनाने को संदेश दे रहा है।

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