विकास की हवा

बहुत दिनों तक इस मुग़ालते में रह लिए कि अपन तो सिर्फ विकास की मलाई खाएँगे। घर दूसरों के उजड़ेंगे, ज़मीनें दूसरों की जाएँगी। घर-बार से बाहर खदेड़े गए शहरों की खाक छानते लोगों की कतारों में दूसरे लोग होंगे। आदिवासी, खेतिहर मज़दूर, किसान, दलित। हमें क्या?
अब तक तो किस्सा कुछ ऐसा ही चलता दिख रहा था। मगर अचानक हमारे पाँवों तले ज़मीन काँप उठी है। विकास का ज़हर हवा में घुल चुका है और यह ज़हरीली हवा हमारी गलियों, मोहल्लों से होते हुए घर तक दस्तक दे रही है। या शायद घर के अन्दर पहुँच चुकी है।
देते रहिए पराली जलाते किसानों को जितना जी चाहे उतना गालियाँ लेकिन इससे सच्चाई तो नहीं बदल जाती कि यह बीमारी उससे कहीं ज़्यादा गहरी है जितना हम मानना चाहते हैं।
और यह बीमारी सिर्फ दिल्ली की नहीं। देश का हर छोटा-बड़ा शहर आज इस ज़हर की मार से कराह रहा है। विकास की गर्द और धुँए से हमारी आँखें और फेफड़े जाम हो चुके हैं। लेकिन क्या इतना ज़्यादा कि साफ देखने और समझने की हमारी क्षमता ही ख़त्म हो गई है?

– लोकेश मालती प्रकाश

 

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