आरक्षण के विरोध में एक सवर्ण दृष्टिकोण

आरक्षण पर बहस होते ही अक्सर यह मान लिया जाता है कि जो व्यक्ति आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है, वह सामाजिक न्याय का विरोधी है। यह धारणा उचित नहीं है। एक सवर्ण नागरिक के नजरिए से आरक्षण का विरोध किसी वर्ग से नफरत नहीं, बल्कि समान अवसर और योग्यता के सिद्धांत पर सवाल उठाने का अधिकार है।

सदियों पुरानी सामाजिक असमानताओं को दूर करना जरूरी था और आज भी सामाजिक भेदभाव के खिलाफ मजबूती से खड़ा होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसका समाधान पीढ़ियों तक चलने वाली आरक्षण व्यवस्था ही है?

आज एक सामान्य वर्ग का गरीब छात्र भी उसी प्रतियोगिता में बैठता है। वह भी सरकारी स्कूल में पढ़ सकता है, आर्थिक कठिनाइयों से जूझ सकता है, दिन-रात मेहनत कर सकता है और फिर भी केवल अपनी जाति के कारण उसे वही अवसर नहीं मिल पाता जो किसी आरक्षित वर्ग के अपेक्षाकृत संपन्न विद्यार्थी को मिल सकता है।

यहीं से असली सवाल पैदा होता है—क्या गरीबी की कोई जाति होती है? अगर कोई गरीब परिवार अपने बच्चे की फीस, किताबें और कोचिंग तक मुश्किल से जुटा पाता है, तो उसके बच्चे के संघर्ष को केवल इसलिए कम क्यों माना जाए कि वह सामान्य वर्ग से आता है?

दूसरी ओर, यदि आरक्षण का लाभ पाने वाला परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी आगे निकल चुका है, तो क्या उसके बच्चों को भी उसी स्तर का आरक्षण लगातार मिलता रहना चाहिए? यदि उद्देश्य वास्तव में सबसे कमजोर व्यक्ति को अवसर देना है, तो व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लाभ बार-बार उन्हीं परिवारों तक सीमित न रहे।

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आरक्षण का उद्देश्य प्रतिनिधित्व और अवसर बढ़ाना था, लेकिन आज कई बार यह जातिगत पहचान को और मजबूत करने वाला माध्यम भी दिखाई देता है। जिस समाज को जाति की दीवारों से बाहर निकालना चाहिए, कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सरकारी नीतियों के माध्यम से उन्हीं पहचान को लगातार राजनीतिक और सामाजिक महत्व दे रहे हैं?

एक और महत्वपूर्ण सवाल है—क्या किसी परीक्षा में सफल होने वाले दो विद्यार्थियों के लिए अलग-अलग मानक रखना लंबे समय में समाज में असंतोष पैदा नहीं करेगा? मेहनत करने वाले सामान्य वर्ग के विद्यार्थी के मन में यह भावना पैदा होना स्वाभाविक है कि उसकी मेहनत का मूल्यांकन केवल उसकी जाति के आधार पर कम कर दिया गया। यह भावना भी सामाजिक वास्तविकता है और इसे नजरअंदाज करना समस्या को और बढ़ा सकता है।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि आर्थिक रूप से कमजोर, सामाजिक रूप से पिछड़े या ऐतिहासिक रूप से वंचित लोगों को सहायता नहीं मिलनी चाहिए। सहायता जरूर मिलनी चाहिए—लेकिन ऐसी व्यवस्था के बारे में गंभीरता से विचार होना चाहिए जिसमें जरूरत, आर्थिक स्थिति, शिक्षा का स्तर और वास्तविक वंचना भी महत्वपूर्ण आधार हों।

सरकार यदि गरीब विद्यार्थियों को मुफ्त या बेहतर शिक्षा, छात्रवृत्ति, कोचिंग, हॉस्टल, किताबें और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए तो इससे किसी भी वर्ग के गरीब बच्चे को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा। किसी व्यक्ति को उसके जन्म के कारण हमेशा विशेषाधिकार देना भी सही नहीं है और किसी को उसके जन्म के कारण हमेशा नुकसान में रखना भी सही नहीं है। सामाजिक न्याय का अर्थ केवल वंचित को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि किसी दूसरे के साथ अन्याय किए बिना आगे बढ़ाना भी है। इसलिए आरक्षण पर बहस को “सवर्ण बनाम दलित”, “आरक्षित बनाम अनारक्षित” या “योग्य बनाम अयोग्य” की लड़ाई बनाना बंद करना होगा।

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एक सवर्ण नागरिक का सवाल सीधा है— अगर समानता हमारा अंतिम लक्ष्य है, तो हमारी नीतियां हमें जाति से बाहर निकाल रही हैं या जाति को और स्थायी बना रही हैं? आरक्षण पर सवाल उठाना संविधान या सामाजिक न्याय का अपमान नहीं है। लोकतंत्र में हर नीति की समीक्षा हो सकती है। जरूरत है ऐसी व्यवस्था की, जिसमें सहायता वास्तव में जरूरतमंद तक पहुंचे और किसी भी बच्चे को केवल उसके जन्म के कारण अवसर से वंचित न होना पड़े। क्योंकि न्याय का मतलब सिर्फ किसी एक को अवसर देना नहीं, बल्कि अवसर के लिए खड़े हर व्यक्ति के साथ न्याय करना है।

– एम के पांडेय निल्को

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