क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख गिर रही है?
भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम पिछले एक दशक से सबसे प्रभावशाली नेताओं में लिया जाता है। वर्ष 2014 में जब उन्होंने केंद्र की सत्ता संभाली, तब देश भ्रष्टाचार, महंगाई और नीतिगत अस्थिरता जैसे मुद्दों से जूझ रहा था। “सबका साथ, सबका विकास” के नारे के साथ जनता ने उन्हें ऐतिहासिक जनादेश दिया। 2019 में यह विश्वास और अधिक मजबूत हुआ, जब भाजपा पहले से भी अधिक सीटों के साथ सत्ता में लौटी। उस दौर में ऐसा प्रतीत होने लगा था कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अपने चरम पर है और उनके सामने कोई बड़ा राजनीतिक विकल्प दिखाई नहीं देता।
हालांकि लोकतंत्र का स्वभाव ही परिवर्तनशील है। जनता किसी भी सरकार को स्थायी समर्थन नहीं देती, बल्कि उसके कामकाज के आधार पर समय-समय पर उसका मूल्यांकन करती है। यही कारण है कि आज देश में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक साख पहले जैसी नहीं रही? यह प्रश्न केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों और आम नागरिकों के बीच भी चर्चा का विषय है।
इस चर्चा के पीछे कई कारण हैं। देश में लगातार बढ़ती महंगाई, युवाओं के लिए रोजगार के सीमित अवसर, किसानों की आय से जुड़ी चुनौतियाँ, छोटे व्यापारियों की आर्थिक परेशानियाँ और मध्यम वर्ग की बढ़ती चिंताएँ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सरकार को लगातार सवालों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर सरकार का पक्ष यह है कि भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है, डिजिटल क्रांति ने नई पहचान बनाई है, बुनियादी ढाँचे में अभूतपूर्व निवेश हुआ है, रेलवे, एक्सप्रेसवे, रक्षा और विदेश नीति के क्षेत्र में देश ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं।
दरअसल, किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों से नहीं होता, बल्कि जनता यह भी देखती है कि उन उपलब्धियों का प्रभाव उसके अपने जीवन पर कितना पड़ रहा है। यदि आर्थिक विकास के आँकड़े बेहतर हों, लेकिन आम नागरिक को रोजगार, आय और जीवन-यापन में कठिनाई महसूस हो, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। यही स्थिति वर्तमान राजनीतिक विमर्श में दिखाई देती है।
2024 के लोकसभा चुनाव ने भी यह संकेत दिया कि भारतीय राजनीति अब पहले से अधिक प्रतिस्पर्धी हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन पूर्ण बहुमत के बजाय सहयोगी दलों के साथ सरकार बनानी पड़ी। इसे कुछ लोग लोकतंत्र में संतुलित जनादेश मानते हैं, जबकि कुछ विश्लेषक इसे भाजपा और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी के लिए जनता का एक स्पष्ट संदेश बताते हैं कि अब केवल व्यक्तित्व नहीं, बल्कि शासन के परिणामों पर भी अधिक ध्यान देना होगा।
सोशल मीडिया ने भी राजनीति की प्रकृति बदल दी है। आज सरकार का हर निर्णय कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुँच जाता है। समर्थक उपलब्धियों को प्रमुखता से सामने रखते हैं, जबकि आलोचक कमियों को उजागर करते हैं। ऐसे माहौल में लोकप्रियता का आकलन पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गया है। इसलिए केवल सोशल मीडिया की बहसों के आधार पर किसी नेता की साख का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
यह भी सच है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज भी देश के सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते हैं। उनके समर्थकों का आधार अभी भी बहुत बड़ा है और भाजपा की राजनीति काफी हद तक उनके नेतृत्व पर ही केंद्रित है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जनता की अपेक्षाएँ अब पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी हैं। जनता अब केवल घोषणाएँ नहीं, बल्कि अपने जीवन में वास्तविक परिवर्तन देखना चाहती है। यही किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है।
भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहाँ कोई भी नेता जनता से ऊपर नहीं होता। जनता समय-समय पर सरकारों को अवसर भी देती है और आवश्यक होने पर संदेश भी देती है। इसलिए यह कहना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख पूरी तरह समाप्त हो रही है, उतना ही अतिरंजित होगा जितना यह कहना कि उनकी लोकप्रियता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं दिखाई देती है, जहाँ उपलब्धियाँ भी हैं, चुनौतियाँ भी हैं और जनता की बढ़ती अपेक्षाएँ भी।
अंततः किसी भी लोकतंत्र में किसी नेता की वास्तविक शक्ति उसकी छवि नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। यदि सरकार आने वाले समय में रोजगार, महंगाई, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुशासन जैसे मुद्दों पर ठोस परिणाम देती है, तो यह विश्वास और मजबूत हो सकता है। लेकिन यदि अपेक्षाओं और वास्तविक उपलब्धियों के बीच दूरी बढ़ती है, तो जनता अपना निर्णय बदलने में भी देर नहीं करती। लोकतंत्र में यही सबसे बड़ा सत्य है कि अंतिम फैसला न विपक्ष करता है, न सत्ता पक्ष और न मीडिया—अंतिम निर्णय हमेशा जनता का होता है।
– एम के पाण्डेय ‘निल्को ’