चपरासी बनने को तैयार हैं MBA-MSc पास लाखों युवा: बेरोजगारी की मार में डिग्री की कीमत पर सवाल

नई दिल्ली, 18 सितंबर 2025: भारत में उच्च शिक्षा के बावजूद बेरोजगारी का संकट इतना गहरा हो चुका है कि एमबीए और एमएससी जैसी प्रतिष्ठित डिग्रियों के धनी लाखों युवा अब चपरासी, क्लर्क और अन्य निम्न-स्तरीय सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने को मजबूर हैं। हालिया सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में देखा गया है कि इन पदों के लिए लाखों ग्रेजुएट्स ने आवेदन दाखिल किए हैं, जो शिक्षा प्रणाली और रोजगार बाजार के बीच के भयावह अंतर को उजागर करता है।

केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) और राज्य स्तरीय भर्ती बोर्डों की हालिया अधिसूचनाओं के अनुसार, चपरासी और मल्टी-टास्किंग स्टाफ (एमटीएस) जैसे पदों के लिए आवेदनों की बाढ़ आ गई है। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश में 5,000 चपरासी पदों के लिए 10 लाख से अधिक आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 40% से ज्यादा एमबीए, एमएससी और इंजीनियरिंग डिग्री धारक थे। इसी तरह, दिल्ली सरकार की एक क्लर्क भर्ती में 2 लाख आवेदनों में 30% स्नातकोत्तर डिग्री वाले युवा शामिल थे।

ये आंकड़े न केवल बेरोजगारी की तीव्रता को दर्शाते हैं, बल्कि दिखाते हैं कि कैसे युवा अपनी योग्यता से ऊपर उठकर स्थिरता की तलाश में हैं। एक एमबीए ग्रेजुएट, राहुल शर्मा (नाम परिवर्तित) ने बताया, “तीन साल की नौकरी तलाश के बाद मैंने सोचा कि चपरासी की नौकरी भी पक्की है। प्राइवेट सेक्टर में तो अनिश्चितता ही है।” राहुल जैसे हजारों युवा सोशल मीडिया पर अपनी कहानियां साझा कर रहे हैं, जहां #EducatedUnemployed और #ChowkidarToMBA जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।

शिक्षा का संकट: डिग्री क्यों हो रही बेकार?

भारत में हर साल 1.5 करोड़ से अधिक युवा श्रमिक बाजार में प्रवेश करते हैं, लेकिन नौकरियों की संख्या आधी भी नहीं है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के अनुसार, 2024 में स्नातकों की बेरोजगारी दर 23% तक पहुंच गई, जो 2019 के 15% से दोगुनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा प्रणाली स्किल-बेस्ड जॉब्स से मेल नहीं खा रही।

  • स्किल गैप: आईआईएम अहमदाबाद के प्रोफेसर देवांग नानावटी कहते हैं, “एमबीए सिखाता है मैनेजमेंट, लेकिन बाजार डिजिटल स्किल्स मांग रहा है। बिना अपस्किलिंग के डिग्री कागज का टुकड़ा बन जाती है।”
  • प्राइवेट सेक्टर की अनिश्चितता: कोविड के बाद स्टार्टअप्स के पतन और कॉर्पोरेट लेऑफ ने युवाओं को सरकारी नौकरियों की ओर धकेल दिया।
  • आरक्षण और प्रतिस्पर्धा: सामान्य वर्ग के युवाओं के लिए प्रतिस्पर्धा और भी कठिन हो गई है, जिससे वे निम्न पदों पर भी उतर आते हैं।
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श्रम एवं रोजगार मंत्री ने संसद में कहा कि सरकार ‘स्किल इंडिया’ मिशन को मजबूत कर रही है, जिसके तहत 2025 तक 4 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग दी जाएगी। लेकिन युवा संगठनों का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं। ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन के अध्यक्ष ने मांग की, “शिक्षा को जॉब-ओरिएंटेड बनाएं, वरना यह चक्र जारी रहेगा।”

इस बीच, युवाओं को सलाह दी जा रही है कि वे फ्रीलांसिंग, ऑनलाइन कोर्स और उद्यमिता पर फोकस करें। प्लेटफॉर्म्स जैसे अपवर्क और लिंक्डइन पर स्किल-बेस्ड प्रोफाइल बनाने से निजी क्षेत्र में अवसर बढ़ सकते हैं।

एमबीए-एमएससी पास युवाओं का चपरासी बनने को तैयार होना दुखद है, लेकिन यह एक चेतावनी है। यदि समय रहते शिक्षा और रोजगार के बीच का पुल नहीं जोड़ा गया, तो लाखों सपने चूर हो जाएंगे। सरकार, उद्योग और युवाओं को मिलकर काम करने का समय आ गया है। क्या आप भी इस संकट से जूझ रहे हैं? अपनी कहानी साझा करें।

(यह लेख नवीनतम सरकारी आंकड़ों और विशेषज्ञ राय पर आधारित है। अधिक अपडेट के लिए फॉलो करें।)

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