बीजेपी की तिरंगा यात्रा: राष्ट्रीयता का ढोंग या वोट की राजनीति?
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 13 मई से 23 मई 2025 तक देशभर में तथाकथित ‘तिरंगा यात्रा’ निकालने का ऐलान किया है। पार्टी का दावा है कि यह यात्रा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वाकई में राष्ट्रीयता का उत्सव है या फिर बीजेपी की वोट बैंक की सियासत का एक और नाटक?
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के नाम पर बीजेपी अपनी पीठ थपथपाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में भारत ने जो कार्रवाई की, उसे बीजेपी अब अपनी तिजोरी में एक और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह भुनाने की कोशिश में है। लेकिन क्या यह यात्रा वाकई में भारतीय सेना के शौर्य को सम्मान देने के लिए है? या फिर यह एक सुनियोजित नौटंकी है, जिसका मकसद 2025 के आगामी उपचुनावों में जनता की भावनाओं को भड़काकर वोट हासिल करना है?
तिरंगा, जो हर भारतीय के गर्व का प्रतीक है, उसे बीजेपी ने बार-बार अपने राजनीतिक एजेंडे का हथियार बनाया है। यह वही पार्टी है, जो हर चुनाव से पहले राष्ट्रवाद का राग अलापती है, लेकिन जब बात देश की असल समस्याओं—बेरोजगारी, महंगाई, और शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाओं—की आती है, तो इनके पास जवाब की जगह सिर्फ नारे होते हैं। तिरंगा यात्रा के नाम पर बीजेपी नेताओं का गांव-गांव, शहर-शहर घूमना और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की गाथा सुनाना, शायद ही देश की जनता को भूख और बेरोजगारी से निजात दिलाए।
पार्टी का कहना है कि यह यात्रा ‘न्यूट्रल बैनर’ के तहत होगी, न कि बीजेपी के झंडों के नीचे। लेकिन क्या जनता इतनी भोली है कि यह न समझे कि इस ‘न्यूट्रल’ बैनर के पीछे बीजेपी का ही एजेंडा है? संबित पात्रा, विनोद तावड़े और तरुण चुग जैसे नेताओं को इस यात्रा का समन्वयक बनाया गया है, जो स्पष्ट करता है कि यह बीजेपी का प्रचार तंत्र ही है। अगर यह वाकई में सेना के सम्मान की बात होती, तो क्या इसे राजनीतिक रंग देने की जरूरत थी? क्या भारतीय सेना का गौरव जनता तक पहुंचाने के लिए बीजेपी की मध्यस्थता जरूरी है?
सबसे हास्यास्पद है बीजेपी का यह दावा कि यह यात्रा ‘राष्ट्रवाद की भावना’ को बढ़ावा देगी। क्या राष्ट्रवाद का मतलब सिर्फ तिरंगा लहराना और नारे लगाना है? अगर बीजेपी को वाकई में देश की चिंता होती, तो वह उन किसानों की सुध लेती, जो आज भी न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए सड़कों पर हैं। वह उन नौजवानों की बात सुनती, जो रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं। लेकिन नहीं, बीजेपी को तो बस तमाशे की जरूरत है—चुनाव नजदीक हैं, और तिरंगा यात्रा से बेहतर तमाशा क्या हो सकता है?
यह यात्रा 23 मई को खत्म हो रही है, ठीक उस समय जब उपचुनावों की गहमागहमी शुरू होगी। संयोग? शायद नहीं। बीजेपी की यह तिरंगा यात्रा राष्ट्रीयता का ढोंग कम, बल्कि वोट की राजनीति का नया हथकंडा ज्यादा लगता है। जनता को चाहिए कि वह इस नौटंकी के पीछे का सच समझे और तिरंगे के सम्मान को सियासी खेल से अलग रखे।
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एम.के. पांडे (एक पत्रकार और टिप्पणीकार हैं, जो भारतीय राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर लिखते आ रहे हैं। वे ‘द न्यूजवाला’ के लिए नियमित रूप से व्यंग्यात्मक और विश्लेषणात्मक लेखन करते हैं।)