48 साल की कानूनी लड़ाई: 104 साल की उम्र में लखन सरोज को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाइज्जत बरी किया

कौशांबी: 104 साल की उम्र में लखन सरोज ने आखिरकार अपनी बेगुनाही साबित कर दी। 48 साल पहले, 1977 में, कौशांबी जिले के गैराए गांव में एक झगड़े के दौरान एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। इस मामले में लखन सरोज पर हत्या का आरोप लगा, और 1982 में प्रयागराज की सेशन कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। लेकिन, लखन ने हार नहीं मानी और अपनी बेटियों के सहयोग से 48 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। आखिरकार, 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें हत्या और हत्या के प्रयास के आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया।

लखन की इस लंबी लड़ाई में उनकी बेटियों ने उनका साथ दिया। वे बार-बार थाने और कोर्ट का चक्कर लगाती थीं, लेकिन जानकारी के अभाव में कई बार सुनवाई की तारीखें छूट जाती थीं। लखन बताते हैं कि उन्होंने कई वकील बदले, लेकिन ज्यादातर ने पैसे लेकर काम नहीं किया। इसके बावजूद, उनकी बेटियों ने हिम्मत नहीं हारी और अंततः हाईकोर्ट में उनकी अपील सुनवाई के लिए स्वीकार की गई।

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष लखन के खिलाफ ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा। मामले में जिन लोगों ने शिकायत दर्ज की थी, उनकी मृत्यु हो चुकी थी, और अन्य सह-आरोपियों में से दो की भी मौत हो गई, जबकि एक अब चलने-फिरने में असमर्थ है। कोर्ट ने माना कि घटना की वास्तविकता को पूरी तरह से साबित नहीं किया जा सका, जिसके आधार पर लखन को बरी किया गया।

लखन की रिहाई के बाद उनके गांव में खुशी का माहौल है। उनकी बेटियों ने कहा, “हमारे पिता को न्याय मिला, और यह हमारे लिए गर्व की बात है।” लखन अब अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहते हैं और खेती-बाड़ी में अपनी बची हुई जिंदगी गुजारना चाहते हैं। इस मामले ने न्याय व्यवस्था में देरी और जानकारी के अभाव के कारण होने वाली परेशानियों को उजागर किया है।

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स्रोत: दैनिक भास्कर, 23 मई 2025

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