केंद्र सरकार का फैसला: जाति जनगणना होगी, मूल जनगणना के साथ गिनती शुरू
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए जाति जनगणना कराने का फैसला किया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि आगामी मूल जनगणना के साथ ही सभी जातियों की गणना की जाएगी। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसकी घोषणा करते हुए कहा, “राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने फैसला किया है कि जाति गणना को आगामी जनगणना में शामिल किया जाए।” यह घोषणा देश की सामाजिक-आर्थिक नीतियों को और समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
जाति जनगणना का उद्देश्य देश की विभिन्न जातियों की आबादी, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और संसाधनों में उनकी भागीदारी का सटीक आंकड़ा जुटाना है। इससे सरकार को आरक्षण, कल्याणकारी योजनाओं और संसाधन वितरण में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने में मदद मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम सामाजिक न्याय को बढ़ावा देगा और पिछड़े वर्गों को उनकी उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित करेगा।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि 1947 के बाद से कांग्रेस सरकारों ने जाति जनगणना का विरोध किया। उन्होंने 2010 का जिक्र किया, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लोकसभा में जाति जनगणना पर विचार की बात कही थी, लेकिन उनकी सरकार ने इसे आगे नहीं बढ़ाया। वैष्णव ने दावा किया कि कांग्रेस ने जाति जनगणना को केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी लंबे समय से जाति जनगणना की वकालत करते रहे हैं। उन्होंने इसे “देश का एक्स-रे” बताते हुए कहा था कि यह सामाजिक न्याय के लिए क्रांतिकारी कदम होगा। हालांकि, सरकार के इस फैसले के बाद कांग्रेस ने इसे अपनी मांग की जीत बताया, लेकिन बीजेपी ने इसे मोदी सरकार की दूरदर्शिता का परिणाम करार दिया।
केंद्र सरकार ने संकेत दिए हैं कि 2025 में शुरू होने वाली जनगणना में जाति गणना को शामिल करने की पूरी तैयारी है। इसके लिए डेटा संग्रह की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाया जाएगा। सभी जातियों की गिनती के लिए विशेष प्रश्नावली तैयार की जाएगी, ताकि सटीक और व्यापक आंकड़े जुटाए जा सकें। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया गोपनीयता और डेटा सुरक्षा के उच्च मानकों के साथ पूरी की जाएगी।
जाति जनगणना का फैसला सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। कई राज्यों, जैसे बिहार और कर्नाटक, ने पहले ही अपने स्तर पर जाति सर्वे किए हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह पहली बार होगा। यह कदम जहां ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के लिए लाभकारी हो सकता है, वहीं कुछ समूह इसे राजनीतिक हथियार के रूप में देख रहे हैं।
इस घोषणा के बाद सोशल मीडिया और जनता के बीच उत्साह देखा जा रहा है। कई लोग इसे सामाजिक समानता की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जाति जनगणना के आंकड़ों का दुरुपयोग या गलत व्याख्या सामाजिक तनाव को बढ़ा सकती है। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि डेटा का उपयोग केवल कल्याणकारी नीतियों के लिए होगा।