पहलगाम हमला और भारतीय राजनीति: बदलता नैरेटिव और नई चुनौतियां

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुआ आतंकी हमला, जिसमें 26 लोग मारे गए, न केवल एक मानवीय त्रासदी है, बल्कि भारतीय राजनीति के लिए एक टर्निंग पॉइंट भी साबित हो रहा है। बैसरन घाटी में पर्यटकों पर अंधाधुंध गोलीबारी ने नरेंद्र मोदी सरकार की ‘न्यू कश्मीर’ नीति की कमजोरियों को उजागर किया है। इस घटना ने भारत-पाकिस्तान संबंधों को नए निचले स्तर पर पहुंचा दिया और देश की आंतरिक राजनीति में धर्म, राष्ट्रवाद, और साइबर युद्ध जैसे मुद्दों को केंद्र में ला दिया।

पहलगाम, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, लंबे समय से आतंकी गतिविधियों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा। लेकिन 22 अप्रैल को लश्कर-ए-ताइबा से जुड़े द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली, हालांकि बाद में उन्होंने इनकार किया। हमले में 26 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे, और कई घायल हुए। इसने सरकार के उस दावे को चुनौती दी कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में आतंकवाद कम हुआ है। हमले के बाद सरकार ने त्वरित कार्रवाई की। अनंतनाग पुलिस, सेना, और CRPF ने व्यापक तलाशी अभियान चलाया, जिसमें 1,500 से अधिक लोगों से पूछताछ की गई। चार संदिग्ध आतंकियों के घर ढहाए गए, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ‘बुलडोजर जस्टिस’ पर रोक लगाई थी। इसके अलावा, 537 पाकिस्तानी नागरिकों को अटारी-वाघा बॉर्डर के रास्ते वापस भेजा गया, और भारत ने 1960 के सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया।

पहलगाम हमले ने भारतीय राजनीति में तीखे ध्रुवीकरण को जन्म दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमलावरों को “पृथ्वी के किसी भी कोने से ढूंढकर सजा देने” की कसम खाई, जबकि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद करार दिया। भारतीय नौसेना ने अरब सागर में मिसाइल परीक्षण और वायुसेना ने लंबी दूरी के लड़ाकू अभ्यास किए, जो पाकिस्तान को सख्त संदेश देने के लिए माने जा रहे हैं। विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद की। स्वतंत्र राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की, ताकि कश्मीर की स्थिति पर चर्चा हो सके। वहीं, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पाकिस्तान के तटस्थ जांच के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने शुरू में हमले को ही नकार दिया था। हालांकि, कुछ बयानों ने विवाद को और हवा दी। असम के AIUDF विधायक अमीनुल इस्लाम ने हमले को “मोदी-शाह की साजिश” करार दिया, जिसके बाद उन्हें देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इसी तरह, भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने हमले में पाकिस्तान की भूमिका से इनकार कर विवाद खड़ा किया। इन बयानों ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं उकसाईं, जहां कई यूजर्स ने इसे “राष्ट्र विरोधी” करार दिया।

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पहलगाम हमले ने भारतीय राजनीति में धर्म आधारित एकता को बढ़ावा दिया। RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, “जो लोग धर्म पूछकर हत्या करते हैं, हिंदू ऐसा नहीं करते। भारत अहिंसा में विश्वास करता है, लेकिन दुष्टों को सबक सिखाना भी हमारी परंपरा है।” सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा गया कि हमले ने “जाति आधारित राजनीति को झटका दिया और धर्म आधारित एकता की नई लहर शुरू की,” जिसका असर आगामी चुनावों में दिख सकता है। इस बीच, कांग्रेस पार्टी एक सोशल मीडिया पोस्ट के कारण विवादों में घिरी, जिसमें सिरकटी तस्वीर के साथ “जिम्मेदारी के समय गायब” का कैप्शन था। बीजेपी ने इसे “सर तन से जुदा” नारे से जोड़कर कांग्रेस पर देश की भावनाओं के साथ खिलवाड़ का आरोप लगाया। कांग्रेस ने सफाई दी कि यह सरकार की विफलताओं को उजागर करने का प्रयास था, लेकिन विवाद थमा नहीं।

हमले के बाद साइबर युद्ध भी तेज हुआ। पाकिस्तानी हैकर्स ने राजस्थान सरकार की शिक्षा विभाग की वेबसाइट हैक कर भड़काऊ संदेश पोस्ट किए, जिसमें लिखा था, “अगला हमला गोलियों से नहीं, टेक्नोलॉजी से होगा।” यह भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते साइबर तनाव का हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अमेरिका ने हमले की निंदा करते हुए भारत को पूर्ण समर्थन का आश्वासन दिया। FBI निदेशक काश पटेल ने इसे “आतंकवाद का क्रूर चेहरा” करार दिया। वहीं, चीन ने पाकिस्तान का समर्थन करते हुए संयम बरतने की सलाह दी, जिसे भारत ने ठुकरा दिया। पाकिस्तान ने रूस और चीन से तटस्थ जांच की मांग की, लेकिन भारत ने इसे “दिखावा” करार दिया।

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कश्मीर विशेषज्ञों का मानना है कि पहलगाम हमला मोदी सरकार की कश्मीर नीति की विफलता को दर्शाता है। सुमंत्र बोस, एक राजनीतिक वैज्ञानिक, ने कहा कि यह हमला “न्यू कश्मीर के गुब्बारे को फोड़ने वाला” साबित हुआ। प्रवीण डोंठी ने सुझाव दिया कि भारत को पाकिस्तान के साथ गुप्त बैक-चैनल वार्ता शुरू करनी चाहिए, जैसा कि 2021 में UAE की मध्यस्थता में हुआ था। पहलगाम हमला भारतीय राजनीति के लिए एक जटिल चुनौती है। यह न केवल सुरक्षा और कूटनीति का मामला है, बल्कि आंतरिक एकता और चुनावी रणनीति को भी प्रभावित कर रहा है। सरकार को चाहिए कि वह कश्मीरियों के साथ संवाद बढ़ाए, साइबर सुरक्षा मजबूत करे, और आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठाए। साथ ही, राजनीतिक दलों को इस त्रासदी का उपयोग वोट बैंक के लिए करने से बचना होगा।

पहलगाम की यह घटना हमें याद दिलाती है कि शांति और विकास का रास्ता कांटों से भरा है, लेकिन साहस और एकता के साथ भारत इन चुनौतियों से पार पा सकता है।

एम. के. पांडे ‘निल्को’  (स्वतंत्र आलोचक और पत्रकार)

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