वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस: कपिल सिब्बल बोले- 20 करोड़ लोगों की आस्था पर हमला
16 अप्रैल 2025 | The Newswala नई दिल्ली: वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई शुरू हुई। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तीखी दलीलें दीं। सिब्बल ने कहा कि यह कानून 20 करोड़ मुस्लिमों की आस्था और धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है, जो संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है।
सिब्बल ने कोर्ट में कहा, “यह संसदीय कानून 20 करोड़ लोगों की आस्था में हस्तक्षेप करता है। वक्फ बोर्ड और सेंट्रल वक्फ काउंसिल में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना अनुच्छेद 26 का सीधा उल्लंघन है। हिंदू या सिख धार्मिक निकायों में केवल उनके समुदाय के लोग ही नामित होते हैं, लेकिन वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति धार्मिक स्वायत्तता को कमजोर करती है।” उन्होंने वक्फ-बाय-यूजर की अवधारणा को हटाने पर भी सवाल उठाया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या फैसले में मान्यता दी थी। सिब्बल ने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है। इसे खत्म करना संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर करता है।” इसके अलावा, उन्होंने कानून के उस प्रावधान पर आपत्ति जताई, जिसमें वक्फ बनाने के लिए किसी व्यक्ति को पांच साल तक इस्लाम का अभ्यास करने का प्रमाण देना होगा। सिब्बल ने पूछा, “राज्य को यह तय करने का अधिकार कौन देता है कि मैं मुस्लिम हूं या नहीं?”
वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को 5 अप्रैल 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिली और यह 8 अप्रैल से लागू हुआ। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 73 से अधिक याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी, AAP नेता अमानतुल्लाह खान, DMK, RJD, और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठन शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय की संपत्ति और धार्मिक अधिकारों को कमजोर करता है, जो अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव निषेध), 21 (जीवन और स्वतंत्रता), और 300A (संपत्ति का अधिकार) का उल्लंघन है। वहीं, केंद्र सरकार और छह बीजेपी शासित राज्य—हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, असम, राजस्थान, और छत्तीसगढ़—ने कानून का समर्थन करते हुए कहा है कि यह वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाएगा। केंद्र ने दावा किया कि यह कानून किसी धार्मिक प्रथा या संस्था में हस्तक्षेप नहीं करता।
मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने सुनवाई की शुरुआत में दो सवाल उठाए: पहला, क्या सुप्रीम कोर्ट को इस मामले की सुनवाई करनी चाहिए या इसे हाई कोर्ट में भेजा जाए? दूसरा, याचिकाकर्ता किन मुद्दों पर बहस करना चाहते हैं? CJI ने कहा, “हमें बताया गया कि दिल्ली हाई कोर्ट वक्फ की जमीन पर बना है। हम यह नहीं कह रहे कि सभी वक्फ-बाय-यूजर गलत हैं, लेकिन इसमें वास्तविक चिंता है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जामा मस्जिद जैसे प्राचीन स्मारक संरक्षित रहेंगे। वक्फ कानून के खिलाफ देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हुए हिंसक प्रदर्शनों में तीन लोगों की मौत हो गई और 221 लोग गिरफ्तार किए गए। ममता बनर्जी की सरकार ने मृतकों के परिवारों को 10 लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है। त्रिपुरा में भी विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिसमें 18 पुलिसकर्मी घायल हुए।
वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई देश के 20 करोड़ मुस्लिमों की आस्था, संपत्ति अधिकारों, और संवैधानिक स्वतंत्रता के सवालों को केंद्र में ला रही है। कपिल सिब्बल की दलीलों ने कानून की खामियों को उजागर किया है, लेकिन केंद्र का पारदर्शिता का दावा भी विचारणीय है। यह मामला न केवल कानूनी, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी संवेदनशील है। The Newswala इस मामले पर नजर रखे हुए है और पाठकों को नवीनतम अपडेट्स प्रदान करता रहेगा।
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