मानवीय रिश्तों के कोमल भावों की अभिव्यक्ति- चाँदनी रात का एक दुखान्त

जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में रवीन्द्र नाथ ठाकुर की कहानी ‘अंतिम रात’ से प्रेरित एवं राजीव मिश्रा द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक ‘चाँदनी रात का एक दुखांत‘ का मंचन किया गया | पिछले हफ्ते 7 मई को देश भर में टैगोर का जन्मदिन मनाया गया ,ऐसे अवसर पर यह प्यस्रुति अर्तवान है | थह नाटक तत्कालीन बंगाल के सामाजिक ताने-बाने को बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है | व्यक्ति के संवेदनशील मनोभावों की अभिव्यक्ति और स्त्री पुरुष के रिश्तों के महीन रेशों को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करता है | आपसी रिश्तों के बीच की आत्मीयता और पीड़ा की कलात्मक अभिव्यक्ति कह सकते हैं | नाटक के जरिये बंगाली परिवार की सूक्ष्म संवेदना उत्तर भारतीय दर्शकों के मन को छू लेती है | राजीव मिश्रा द्वारा लिखित नाट्य आलेख की शिल्प संरचना, कसाव और भावपूर्ण संवाद इसकी नींव रखते हैं | संवादों में भाषायी गरिमा बनी रहती है |बाकी काम रंगभाषा ने संपन्न किया | स्क्रिप्ट की कसावट का कमाल ही था कि एक घंटा पंद्रह मिनट की अवधि तक दर्शक न केवल बंधे रहे बल्कि आनंद की अनुभूति करते रहे | टैगोर मानवीय मन के तंतुओं को बहुत बारीकी से अपनी रचनाओं में उकेरते हैं जिसे नाटक में बनाये रखना आसान नहीं होता |

नाटक का नायक यतिन एक गंभीर रोग से पीड़ित है और माँ-बाप के देहांत के बाद अपनी मौसी की परवरिश में है | यतिन स्वभाव से गंभीर एवं संवेदनशील जिसका विवाह अपने से काफी कम उम्र की स्वच्छंद हंसमुख मणि से हो जाता है | मणि के व्यवहार में बचपना है | उसकी रूचि रंगमंच में है लेकिन विवाह के बाद पति-पत्नी के रिश्तों के प्रति संवेदनशील नहीं है | यतिन की गंभीर बीमारी के कारण मणि को यतिन से अलग रखती है | यतिन की बीमारी की गंभीरता से मणि अपरिचित है | यहाँ तक कि अकेलेपन से घबरा कर मणि अपने मायके चली जाती है | मौसी उसके व्यवहार से बेहद व्यथित होती है | उधर यतिन अपने अंतिम समय में मणि के साथ रहना चाहता है | मणि के जाने की खबर जैसे ही उसे मिलती है वह टूट जाता है | मौसी जब तक मणि को मायके से वापस लेकर जब तक लौटती है तब तक यतिन अंतिम यात्रा पर निकल जाता है | नाटक में विभिन्न घटनाक्रमों को बहुत खूबसूरती से पिरोया गया है | मणि से यतिन से चाबी मांगने का दृश्य, यतिन की मणि को देखने की वेदनायुक्त ललक और अंतिम विदा जैसे भावपूर्ण दृश्य मन को छू लेते हैं | मृत्यु का भय , प्रेम की तड़प और विवशता के मिश्रित भाव एक अभिनेता के लिए चुनौती हैं तो अवसर भी हैं |

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निर्देशक ने तकनीक का भी कुशलता पूर्वक इस्तेमाल किया है | नदी में नौका चालन तथा अंगूठी पहनाने का दृश्य एवं यतिन के आंतरिक मनो भावों को व्यक्त करने के लिए भय के प्रतीक के रूप में बाघ का मेटाफर उनकी कल्पना शीलता को बताते हैं | यानी नाटक में प्रतीकों के माध्यम से भी बहुत कुछ कहा गया है | चांदनी रात को संवादों के जरिये अर्थवत्ता प्रदान की गई | कलाकारों के सशक्त अभिनय ने नाटक को नए आयाम दिए | चाहे रिहर्सल का कॉमिक दृश्य हो या विरह की पीड़ा झेलता यतिन हो या मणि का बचपने से भरा व्यवहार हो | मौसी, यतिन और यहाँ तक कि नौकर शम्भू का भावपूर्ण अभिनय नाटक को ऊंचाइयां प्रदान करता है | सृष्टि गाँधी(मौसी),महेश महावर(शंभू),रीचा पालीवाल(बिंदु), संदीप कुमार स्वामी(यतिन), सुमित निठारवाल(सत्येन बाबू ), निधि सिंह(सुनयना) ,सिद्धि पालीवाल(दुल्हन) और ओमप्रकाश सैनी(पिता)ने अच्छा अभिनय किया | यतिन ,मौसी और मणि के साथ के सूक्ष्म संवेदनशील पलों को गहरी अर्थवत्ता प्रदान करने में प्संीण कुमावत के संगीत संयोजन की भी निर्णायक भूमिका रही | सितार, मृदंग, बांसुरी, बीणा और शहनाई की धुनों का बहुत कुशलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया है और संगीत कहीं भी लाउड नहीं होता | प्रकाश संयोजन दृश्यानुकूल था |एक और विशेषता नाटक की अजंता देव के निर्देशन में की गयी वेश-भूषा थी जिसने सेट के साथ मिल कर बंगाली घर के परिवेश को प्रामाणिक बनाया | स्त्री एवं पुरुष पात्रों का धोती एवं साड़ी पहनने का अंदाज़ बंगाल की विशिष्ट शैली को बता रहा था | विपिन शर्मा की मच सजा में बांस से निर्मित दीवारें और उस पर बेल स्वाभाविक लगते हैं | बहुत ज्यादा प्रॉप्स भी नहीं हैं जो मंचन में सीमा बने | केशव गुप्हा की मुख सज्ता एवं अनीश कुरैशी की नृत्ज संकल्यना सराहनीय थी | हर प्रस्तुति के बाद कुछ और बेहतर किये जाने की संभावना बनी रहती है किन्तु फिर भी यह प्रस्तुति प्रशंसनीय रही | ( छाया चित्र राजेश कुमार सोनी तथा राजीव मिश्रा द्वारा दिए गए हैं )

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