एक सच्ची भारतीय फिल्म लाल सिंह चड्ढा

एक अनाड़ी और होशियार इंसान में क्या फर्क होता है: “भोला तो हर एक बात को सच मानता है, परन्तु चतुर मनुष्य अपना ही मतलब समझ बूझकर एक एक कदम चलता है।लेकिन यह भी सिध्द है कि सरलता और सहजता के बराबर और कोई भी महत्वपूर्ण गुण आज  तक संसार में खोजा नहीं गया। असंख्य लोग स्वाभाविक होने के बजाय धोखे के नकली सिक्के चलाने में अपने जीवन को बिगाड़ चुके हैं।’ संभव है कि इससे क्षणिक सफलता मिल जाए परंतु लक्ष्य कभी पूरी तरह प्राप्त नहीं होता।बस यही संदेश है इस फिल्म का ।यह फिल्म शुरू होती है ट्रेन के एक सफर से। इधर सफर शुरू होता है, उधर लाल की कहानी। लाल सिंह चड्ढा (आमिर खान) एक मानसिकता के साथ पैदा होता है, जिसकी वजह से उसकी समझ बाकी लोगों से थोड़ी अलग है। समझदारी की कुछ हदों में रहकर गढ़े गए ‘सामान्य’ से, थोड़ा भी अलग होने पर जैसा कि अक्सर किया जाता है, वैसे ही लाल को भी अधिकतर लोग ‘कमजोर’ मान कर चलते हैं.लेकिन उसकी मां (मोना सिंह) उसे बचपन से ट्रेनिंग दे देती है कि वो किसी से कम नहीं है। लाल को बचपन में चलने में भी समस्या रहती है. लेकिन एक दिन वो भागता है  और ऐसा भागता है कि लगता है हवा से तेज दौड़ रहा हो  लाल के बचपन की दोस्त है रूपा।मां के अलावा लाल को सिर्फ रूपा ने ही प्यार दिया है  लाल की कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वो देश की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह बनता जाता है  हालांकि, उसकी अपनी समझ में इन घटनाओं का असर वैसा नहीं है, जैसा आपको महसूस होगा। बल्कि इन घटनाओं पर जब लाल रिएक्ट करता है तो आप हैरान हो कर खुद से पूछ बैठते हैं कि क्या सच में जिसे हम समझ कहते हैं, उससे दुनिया का कुछ भला हुआ है? लेकिन कहानी सिर्फ लाल की नहीं है, रूपा (करीना कपूर) की भी है. लाल के दिल में रहने वाली रूपा के खुद के मन पर बहुत बोझ है और घुटन है पर लाल को उस पर जितना भरोसा है, वो देखकर आपको उसके लिए खराब भी लगेगा और सहानुभूति भी होगी। लेकिन ये किरदार ऐसा है कि अगर आपको रूपा जैसी सचची और अपने हालात से जूझती कभी सच में भी मिली होगी , और आप भी उसे शायद सही तरह से न समझ पाये । जिंदगी को ज



गोलगप्पे जैसी मानने वाले लाल सिंह चड्ढा’ की सबसे बड़ी खासियत इसके भावुकतापूर्ण दृश्य है। ये फिल्म कई जगह पर इतने खूबसूरत और प्यारे संकेत और प्यार से भरी है कि इन्हें देखते हुए आपका दिल बागबाग हो जाएगा। एक ऐसा इंसान जिसे आम तौर पर कम समझ वाला माना जाए, हर किसी की भावुकता को  लेकर उसकी समझ कितनी सटीक और सरल है ये आपको हैरान करता रहेगा। और ये भे  सिर्फ पर्दे पर ही नहीं दिखते, आपको अपने अंदर भी उमड़ते-घुमड़ते महसूस होंगे। लाल और उसकी मां के किरदार आपको अंदर तक प्रभावित करेंगे ।लाल के किरदार के जरिए फिल्म कुछ बड़ी राजनीतिक घटनाओं को जिस तरह से दिखाती है वो बहुत संवेदनशील है  इन घटनाओं ने लोगों की सोच, उनकी जिंदगी पर कितना असर किया है ये सोशल मीडिया पर आपको आराम से दिख जाएगा  लेकिन फिल्म का हीरो कोई भी विचार लेकर नहीं चलता और इन घटनाओं के बीच मौजूद होते हुए भी जैसे अनछुआ रह जाता है ।लाल अपनी इस मासूमियत से दुनिया की हर घटना पर मिनटों के अंदर सोशल मीडिया पर कोहराम कर देने की जल्दी में बैठे लोगों पर सवाल खड़ा कर देता है  ‘लाल सिंह चड्ढा’ में थीम की तरह तैयार किए गए गाने ‘कहानी’ में एक लाइन है जो इस सवाल को शक्ल देती है- ‘है, तेरी मेरी समझदारी समझ पाने में, या इसको ना समझना ही समझदारी  अपनी भूमिका के हिसाब से शरीर को ढाल लेना, लुक बदल लेना, ये सब अभिनय का जरूरी हिस्सा है और इसमें आमिर बहुत पहले से समर्पित हैं. लेकिन इस बार जो सहज और भावुकतापूर्ण रूप में आमिर दिखाते हैं कि अपनी अदा में वो और बेहतर ही होते जा रहे हैं.यह लाल सिंह के किरदार की मासूमियत का गजब अंदाज है कि कारगिल की जंग में वो अपने साथियों के साथ-साथ दुश्मन देश पाकिस्तान के सिपाही की भी जान बचाता है।फिल्म में भारत की ऐतिहासिक, राजनैतिक और धार्मिक घटनाओं का समावेश वीएफएक्स के माध्यम से बखूबी किया गया है। ऑपेरशन ब्लू स्टार, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या, बाबरी मस्जिद विध्वंस, 26/11 के विजुअल्स को कहानी में जोड़ा गया है।



फिल्म के अंत में आमिर का एक सीन तो आपको रुला भी सकता है ।अद्वैत चंदन ने अपनी डेब्यू फिल्म ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ में ही दिखा दिया था कि भावुकता पर  उनकी पकड़ कितनी अचछी है  ‘लाल सिंह चड्ढा’ के हर संवाद बिल्कुल वहीं जा कर हिट करते हैं ,जहां पहुंचने चाहिए थे. अद्वैत के काम में लाल की जिदगी ऐसी है कि डूब कर जीवन रस पी रही है लाल को  एक काम  से दूसरे काम पर जाने की हड़बड़ी नहीं दिखती। सत्यजीत पांडे की सिनेमेटोग्राफी फिल्म का मजबूत हिस्सा है  ।जहां एक तरफ पंजाब, लद्दाख, दिल्ली और कई लोकेशंस की खूबसूरती बराबर दिखती है, वहीं घर-कमरों के दृश्य में भी लाल के चरित्र की तरह हर जगह  एक सरलता का भाव ही रहता है. कारगिल युद्ध के दृश्य में एक ऐसा दृश्य है कि संवाद के बीच आमिर के चेहरे पर जिस एंगल से कैमरा टिका है वो ध्यान खींचता है.तनुज टिकू के सहज संगीत के बिना ‘लाल सिंह चड्ढा’ की बात भी नहीं की जा सकती. गीतो में एक मिठास है और ये कहीं भी किसी बात को बढ़ा नहीं रहा बल्कि उसके साथ एक संतुलित रूप में है. प्रीतम के तैयार किए हुए गाने पहले ही खूब वायरल हो चुके हैं, लेकिन फिल्म देखते हुए तो ‘कहानी’ गाने का भाव ही बहुत अलग है. इसका सोनू निगम वर्जन फिल्म के अंत में आता है और वो भी उतना ही प्यारा है जितना मोहन कन्नन का गाया वर्जन.आमिर-करीना के लव स्टोरी पर प्रीतम की धुनें, अमिताभ भट्टाचार्य के लिरिक्स, सोनू निगम और अरिजीत सिंह की आवाज एक जादू सा तैयार कर देते हैं जिसमें फिल्म देखते हुए आप पूरी तरह खोए रहते हैं फिल्म देखकर आप जब लौट रहे होगे तो कम से कम इतने सरल तो हो ही जायेंगे कि आपको सोशल मीडिया की किसी बात पर गुस्सा नही आयेगा आप जाति,  वर्ग, धर्म और अमीर गरीब वाली भावना से मुक्त होकर, समाज में सबको अपना सा मानने लगेंगे। एक सच्ची भारतीय फिल्म है लाल सिंह चड्ढा।
– हरीश चंद्र पांडे



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