नाथ का हाथ छोड़ सपा के साथ हुए स्वामी

पांडे एन डी देहाती

लोभ संवरण नहीं कर सके। बेटी को सांसद, खुद को मंत्री पद मिलने के बाद भी असन्तोष। बेटे को भी भाजपा ने टिकट दिया लेकिन सपा के मनोज पांडे ने जितने नहीं दिया। अब योगी आदित्यनाथ का हाथ छोड़ कर सपा के साथ हो गए स्वामी। स्वामी प्रसाद मौर्य का लंबा राजनीतिक अनुभव है। वे पैंतरेबाज़ भी हैं। पडरौना विधान सभाई सीट से ही लगातार तीसरी बार और कुल मिलाकर पाँचवीं बार विधायक है। वे विधान परिषद की भी शोभा बढ़ा चुके है। वर्ष 2007 के बाद वे विधान परिषद के सदस्य बन गये थे और फिर बसपा की सरकार में मंत्री रहे। वर्ष 2009 मे पडरौना आये, उसी वर्ष पडरौना क्षेत्र से लोक सभा के चुनाव में बसपा ने उन्हें अपने उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा था। लेकिन वे सांसद नही बन पाये थे। उन्हें कांग्रेस के आरपीएन सिंह जितने नहीं दिए। आरपीएन सिंह लोकसभा जीत गए तो विधान सभा से त्याग पत्र दे दिये। उप चुनाव में बसपा के उम्मीदवार के रूप में मौर्य पडरौना के विधायक बन गये थे। तब से लगातार तीसरी बार वे इसी क्षेत्र के विधायक है।
आईये मौर्य की जीवनी पर एक नजर डालते हैं। प्रतापगढ़ जिले के चकवल गाँव में वर्ष 1954 में जन्में श्री मौर्य विद्यार्थी जीवन में समाजवादी आन्दोलन से जुड़े रहे। बाद में वें लोकदल के हो गये। वर्ष 1996 में वें रायबरेली के डलमऊ विधान सभा क्षेत्र से बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में पहली बार विधायक चुने गये थे और लगातार दो बार वहां के विधायक रहे। उसी दौरान सुश्री मायावती के नेतृत्व वाली सरकार का मंत्री बनने का गौरव भी उन्हें प्राप्त हुआ था। वे मायावती का पैर छूकर प्रणाम करने वाले दमदार मंत्री रहे। दो बार तो वे बसपा के प्रत्याशी के रूप में पडरौना से जीते। अगली बार भाजपा की लहर आयी। उन्होंने बसपा छोड़ दी। पडरौना विधान सभा क्षेत्र में भाजपा के उम्मीदवार के रूप में लगातार तीसरी बार विधायक चुने गये और फिर प्रदेश सरकार में मंत्री भी बने। मंत्री बनने के बाद हुए चुनाव लोक सभाई चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार के रूप में अपनी बेटी संघमित्रा मौर्य को बदायूँ लोक सभा क्षेत्र से मैदान में उतारा था और जिताने में भी सफल रहे। बेटे को भी भाजपा से टिकट दिलवाया था लेकिन सपा के मनोज पांडे के आगे उनकी डाल नहीं गली। अब मौर्य अखिलेश के साथ हैं। यूपी में कई विधायकों को तोड़कर सपा में ले जाने में जुटे हैं।

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