टीजे को और बड़ा थाना, साथ मे कई की नई तैनाती मिली
सत्ता की इतनी खराब हनक, चुल्लू भर पानी मे डूब मरना बेहतर था
लार। एक एसओ को हटाने के लिए अपनी ही सरकार में सड़क पर उतरना पड़े। धरना देना पड़े। प्रदर्शन करना पड़े। दिन भर बाजा बजे। गाल बजे। यह करवा दिया। वह करवा दिया। लाइन हाजिर हो गया। यह सब केवल भाजपा जैसे ही सरकार में सम्भव है। आज किसी भी दूसरी पार्टी की सरकार रहती तो एक छोटा पदाधिकारी अड़ जाता तो कुर्सी चली जाती। यहाँ लार से तेज जगरन्नाथ सिंह को हटाया गया तो तहसील स्तर का बड़ा थाना दे दिया गया। यही नहीं कई सेलों में सड़ रहे दरोगा लोगों को नई तैनाती भी मिल गयी।साइबर सेल में पड़े रहे अनिल कुमार पांडेय को गौरीबाजार मिल गया। चुनाव सेल से सुदेश शर्मा को भलुअनी मिल गया। भवानी भीख राजभर को लाइन से मुक्ति मिली। मईल मिल गया। बहुत को नई तैनाती मिल गयी। कहने का आशय भाजपा ने प्रदर्शन किया। कप्तान साहब को मौका मिल गया। कुल मिलाकर पुलिस विभाग की बल्ले बल्ले ही हो गई। एक बात और जिस प्रदीप शर्मा को तरकुलवा से लार स्थापित किया गया वे टीजे सिंह से कम नहीं चार कदम आगे रहने वाले इंस्पेक्टरों में शुमार हैं।
भाजपा के जो लोग दिन भर अपने फेसबुक और व्हाट्सप ग्रुप पर अपनी संघर्षों पर इतराने जैसे पोस्ट झुला रहे थे वे अपनी हैसियत देख लें। सत्ता में कितनी पैठ है भाजपा के जो लोग आज आंदोलन में रहे उन्हें अपनी समीक्षा करनी होगी और साथ ही इस बात का पता लगाना होगा कि कौन बड़ा नेता संरक्षण दाता निकल गया। यह सच है कि यदि टीजे सिंह नहीं होते तो लद गए होते। 25 सितम्बर 20 को टीजे ने लार का चार्ज लिया। बिचौलियों की दुकानदारी समाप्त कर विभागीय कारखास के भरोसे थाना चलता रहा। लोग उत्पीड़ित होते रहे। अपराध बढ़ते रहे। कभी इस विंदु पर किसी भाजपाई ने आवाज क्यों नहीं मुखर की?
सच सभी को पता है। लार में भाजपा का संगठन कमजोर है। यदि मजबूत रहता तो मौके पर गए एडिशनल एसपी राजेश सोनकर को वहीं घोषणा करनी पड़ती। या देवरिया के पुलिस अधीक्षक डॉ श्रीपति मिश्र जी का वायरलेस सन्देश ही गूंज गया होता कि टीजे सिंह को तत्काल प्रभाव से लाइन हाजीर किया जाता है। लेकिन जानते हैं ऐसा क्यों नहीं हुआ? सच तलाशें।