अनूठी आस्था : इस दुर्गा मंदिर में पशु बलि रोकने के लिए शुरू हुई रक्त बलि की अनोखी परंपरा

देवेंद्र पुरोहित, गोरखपुर | मां दुर्गा की आस्था में लीन भक्‍तों के जप-तप, संयम, त्याग और बलिदान की गाथाएं तो हम सभी ने सुनी है। लेकिन गोरखपुर के बांसगांव तहसील कस्बा में एक ऐसा दुर्गा मंदिर है, जहां पिछले 300 से शरीर के किसी हिस्से से मां दुर्गा को रक्त चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। । यहां श्रीनेत वंश के भारद्वाज गोत्र के युवक शारदीय नवरात्र की नवमी को अपना रक्त मां के चरणों में अर्पित करते हैं। वर्षो से चली आ रही परंपरा को स्थानीय निवासियों ने बरकरार रखा है।इसमें 12 दिन के नवजात से लेकर 100 साल के बुजुर्ग तक का रक्त चढ़ाया जाता है।

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सालों से चली आ रही है परंपरा कब शुरू हुई, इसके बारे में स्थानीय लोगों के पास कोई ठोस जानकारी नहीं है। किवदंतियों के मुताबिक, श्रीनेत वंश के भारद्वाज गोत्र के वंशजों की कुलदेवी दुर्गा मंदिर में विराजती हैं। पहले यहां पशुओं की बलि देने की परंपरा थी। एक बलि कार्यक्रम के दौरान एक महात्मा चौपड़ दास शारदीय नवरात्र के अवसर पर आए। पशु बलि देखने के बाद उन्होंने लोगों को समझाया और अपना रक्त मां दुर्गा की प्रतिमा पर चढ़ाने के लिए प्रेरित किया। उसके बाद ये परंपरा अब तक चली आ रही है। हर शारदीय नवरात्र की नवमी को श्रद्घालु अपनी कुलदेवी की प्रतिमा पर रक्त चढ़ाते हैं।

गांववाले बताते हैं कि यह मां की महिमा ही है कि उस्तरे से खून निकालने के बाद भी आज तक कभी किसी को कोई इन्फेक्शन नहीं हुआ हैं। यही नहीं जहां से खून निकाला जाता वहां देवी स्थान का भभूत लगा देने मात्र से घाव ठीक हो जाता हैं।

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