रावण के ससुराल में शोक, हर बार की तरह नहीं मनाएंगे दशहरा
विजयादशमी यानि दशहरा पर जहां पूरा देश असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक इस दिन खुशी मनाएगा, वहीं जोधपुर में खुद को रावण का वंशज मानने वाले कुछ परिवार शोक मनाएंगे। यहाँ के लोगों की ऐसी मान्यता है कि मंदोदरी के साथ रावण का विवाह जोधपुर में हुआ था। उस समय बारात में आए कुछ लोगों के पूर्वज यहीं पर बस गए थे। इन लोगों ने लंका पति रावण का मंदिर भी बनवा रखा है और नियमित रूप से रावण की पूजा भी करते हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी का कहना है कि इस दिन हम लोग शोक मनाते आए हैं और इस बार भी ऐसा ही होगा। शाम को हम लोग स्नान कर अपनी जनेऊ बदलने के बाद रावण की विधिवत पूजा-अर्चना कर भोग चढ़ाएंगे।
ऐसा कहा जाता है कि असुरों के राजा मयासुर का दिल हेमा नाम की एक अप्सरा पर आ गया था। हेमा को प्रसन्न करने के लिए उसने जोधपुर शहर के निकट मंडोर का निर्माण किया। मयासुर और हेमा के घर एक बहुत सुंदर पुत्री का जन्म हुआ। इसका नाम मंदोदरी रखा गया। एक बार मयासुर का देवताओं के राजा इन्द्र के साथ विवाद हो गया और उसे मंडोर छोड़कर भागना पड़ा। उसके जाने के बाद मंडूक ऋषि ने मंदोदरी की देखभाल की। अप्सरा की बेटी होने के कारण मंदोदरी बहुत सुंदर थी। ऐसी रूपवती कन्या के लिए कोई योग्य वर नहीं मिल रहा था। आखिरकार उनकी खोज उस समय के सबसे बलशाली और पराक्रमी होने के साथ विद्वान राजा रावण पर जाकर पूरी हुई। उन्होंने रावण के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। मंदोदरी को देखते ही रावण उस पर मोहित हो गया और शादी के लिए तैयार हो गया।
रावण अपनी बारात लेकर शादी करने के लिए मंडोर पहुंचा। मंडोर की पहाड़ी पर अभी भी एक स्थान को लोग रावण की चंवरी (ऐसा स्थान जहां वर-वधू फेरे लेते हैं) कहते हैं। बाद में मंडोर को राठौड़ राजवंश ने मारवाड़ की राजधानी बनाया और सदियों तक शासन किया। 1459 में राठौड़ राजवंश ने जोधपुर की स्थापना के बाद अपनी राजधानी को बदल दिया। आज भी मंडोर में विशाल गार्डन आकर्षण का केंद्र है।