जिसने आरक्षण खातिर गिरा दी मुरार जी की सरकार

1977 में जनता पार्टी से मिला था टिकट तो बेच दिया था घर-द्वार

एन डी देहाती

देवरिया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, साहित्यकार व पूर्व सांसद रामनरेश कुशवाहा की कहानी अजीबो गरीब है। 30 अप्रैल 1929 को लार कस्बे के कोइरी टोला में पैदा हुए रामनरेश अपने संघर्षों के बल पर न केवल स्वतन्त्रता आंदोलन में छात्र जीवन में अपना योगदान दिए, बल्कि साहित्य सृजन कर गरीबों, वंचितों की लड़ाई भी लड़ी। युवावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक उन्होंने सामजिक और राजनितिक क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के साथ सृजन में भी नाम कमाया। खण्ड खण्ड पाखण्ड, आरक्षण कब क्यों और कैसे, सोहनपुर की लड़ाई, समाजवाद की दशा व दिशा सहित कुल 22 पुस्तकों के लेखक ने अपने हर साहित्य में शोषण और अत्याचार को अपना मुद्दा बनाया। राजनितिक जीवन में कांग्रेस सरकार के खिलाफ विद्रोही स्वर उठाने वाले रामनरेश कुशवाहा चार महीने की फरारी के बाद जब वेश बदल कर सलेमपुर जंक्शन से गिरफ्तार कर लिए गए। 18 माह जेपी आंदोलन के प्रमुख नेताओं के साथ जेल में जीवन बिताये। उनकी संघर्षशीलता देखकर 1977 में जनता पार्टी ने सलेमपुर से सांसद का टिकट दे दिया। चुनाव लड़ने के लिए पैसे नहीं थे। लार में बेशकीमती दो बीघा जोत की जमीन धर्मनेर के रामबली सोनार को और खपरैल मकान लार के इरीज खा को बेच दिए। सलेमपुर जो कभी कांग्रेस का गढ़ था उसे रामनरेश ने ढहा दिया। मुरार जी की सरकार बनी। आरक्षण को लेकर तत्कालीन प्रधानमन्त्री मुरार जी देसाई से तकरार हो गयी। कुछ दिनों बाद सरकार से इतनी दूरी बनी कि अपने 16 सांसद साथियों के साथ सामूहिक इस्तीफा दे दिए। बाद में 80 सांसद इस्तीफा दिए और मुरार सरकार गिर गयी। जब कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी तो इंदिरा गांधी ने उन्हें मंत्रीपद का प्रलोभन दिया लेकिन उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता नहीं ग्रहण की।

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राजनितिक सफर में तमाम उतार चढ़ाव सहते 7 अक्टूबर 2013 को राम नरेश ने अंतिम सांस ली। उनके पुत्र सुनील कुशवाहा आज भी अपने पिता के मिशन को पूरा करने में दिन रात एक किया करते हैं।

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