राजनीति में मंदिर-मस्जिद बनाम अस्पताल और स्कूल: विकास की राह में कौन-सी प्राथमिकता?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ धर्म, संस्कृति और राजनीति का रिश्ता अत्यंत जटिल और गहराई से जुड़ा हुआ है। अक्सर हम सार्वजनिक विमर्श में देखते हैं कि देश में मंदिर बनेगा या मस्जिद — यह बहस गली-मोहल्ले से लेकर संसद तक पहुँच जाती है। वहीं, दूसरी तरफ अस्पताल की हालत या स्कूलों की गुणवत्ता पर बातचीत अक्सर उपेक्षित रह जाती है।

यह केवल संयोग नहीं है। यह एक सधी हुई रणनीति का हिस्सा है, जिसमें भावनाओं को भुनाया जाता है, और आवश्यक सुविधाओं की चर्चा को हाशिए पर डाल दिया जाता है।

भारत में धार्मिक पहचान एक गहरी भावना है। मंदिर-मस्जिद केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक सामूहिक आत्मगौरव का प्रतीक बन चुके हैं। इन्हें मुद्दा बनाना राजनेताओं के लिए आसान है, क्योंकि इससे लोगों की भावनाएँ तुरंत जुड़ जाती हैं। जहाँ शिक्षा या स्वास्थ्य पर बात करने के लिए आँकड़े, योजनाएँ और निष्पादन की ज़रूरत होती है, वहीं आस्था पर आधारित मुद्दे केवल एक नारे या भावनात्मक भाषण से हवा पकड़ लेते हैं। इसलिए नेताओं को धर्म के इर्द-गिर्द राजनीति करना आसान और त्वरित लाभदायक लगता है।

अस्पतालों और स्कूलों का निर्माण समय मांगता है। उनके लाभ दिखने में वर्षों लगते हैं। यह दीर्घकालिक निवेश है, और हमारे जैसे चुनाव-दर-चुनाव सोचने वाले सिस्टम में नेताओं को इसका तात्कालिक फायदा नहीं दिखता। उदाहरण के लिए — अगर कोई सरकार 100 अच्छे स्कूल बनवाए, तो भी यह मुद्दा चुनाव में उतना प्रभाव नहीं डालता जितना कि कोई धार्मिक स्थल से जुड़ा वादा या विवाद कर सकता है। इसीलिए जनता के स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े मुद्दे अक्सर चुनावी घोषणापत्र के अंतिम पन्नों में सिमट जाते हैं।

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धार्मिक विवाद, नारेबाज़ी, हंगामा — यह सब आज के मीडिया और सोशल मीडिया के लिए टीआरपी का मसाला है। अस्पताल में दवाइयों की कमी या स्कूल में शिक्षक की अनुपस्थिति – यह सब “सुर्खियों” में जगह नहीं बना पाता। नतीजतन, जो दिखता नहीं, वो जनता की प्राथमिकता भी नहीं बनता।

सवाल नेताओं से पहले हमें खुद से पूछना चाहिए – क्या हम अपने वोट का आधार किसी की धार्मिक पहचान बना रहे हैं या उसके कामकाज का मूल्यांकन कर रहे हैं? जब तक हम शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार को वोट की पहली कसौटी नहीं बनाएँगे, तब तक राजनीति मंदिर और मस्जिद के बीच ही झूलती रहेगी।

भारत जैसे विशाल और विकासशील राष्ट्र के लिए मंदिर और मस्जिद की अपनी जगह है — यह हमारी संस्कृति और आस्था का हिस्सा हैं। लेकिन यदि बच्चा स्कूल नहीं जा पा रहा, या गर्भवती महिला इलाज के अभाव में मर रही है, तो हमें अपने मूल्यों और प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा।

राजनीति को यदि सच में राष्ट्रहित से जोड़ना है, तो उसे भावनात्मक मुद्दों से ऊपर उठकर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को प्राथमिकता देनी होगी। और इसकी शुरुआत जनता को करनी होगी — सवाल पूछकर, जवाब मांगकर, और अपने वोट से रास्ता तय करके। बदलाव की शुरुआत हमेशा जनता से होती है। मंदिर-मस्जिद की बहस से आगे बढ़िए, और पूछिए — “मेरे मोहल्ले में स्कूल कब बनेगा?”

  • अभिजीत श्रीवास्तव, मीरजापुर

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