पूर्वांचल एक्सप्रेसवे
देवरिया/सुल्तानपुर। उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल एक्सप्रेसवे एक बार फिर भीषण सड़क हादसों को लेकर सवालों के घेरे में है। महज तीन दिनों के भीतर हुए दो बड़े हादसों में देवरिया जिले से जुड़े सात लोगों की मौत ने पूरे जिले को झकझोर दिया है। दोनों घटनाएं एक्सप्रेसवे पर सुबह के समय हुईं और दोनों हादसों में परिवारों की खुशियां मातम में बदल गईं।
सबसे दर्दनाक बात यह है कि पहले हादसे का गम अभी कम भी नहीं हुआ था कि दूसरे हादसे ने चार और परिवारों को जिंदगीभर का दर्द दे दिया। लगातार हो रही मौतों के बाद अब एक्सप्रेसवे की सुरक्षा व्यवस्था, वाहन संचालन, ट्रकों की स्थिति और चालकों की थकान जैसे सवालों पर चर्चा तेज हो गई है।
पहले हादसे में सूबेदार के परिवार पर टूटा कहर
4 अक्टूबर की सुबह पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर सुल्तानपुर क्षेत्र में एक एंबुलेंस हादसे का शिकार हो गई थी। एंबुलेंस चंडीगढ़ से देवरिया के रुद्रपुर क्षेत्र के रहने वाले सेना के सूबेदार मेजर सत्यवान सिंह का पार्थिव शरीर लेकर उनके पैतृक गांव जा रही थी।
एंबुलेंस में सत्यवान सिंह के बेटे गौरव सिंह, भाई रामसमुझ सिंह, रिश्तेदार राजन चौधरी और चालक जसपाल सवार थे। एक्सप्रेसवे पर एंबुलेंस दुर्घटनाग्रस्त हो गई। हादसे में गौरव और चालक जसपाल की मौके पर मौत हो गई, जबकि गंभीर रूप से घायल रामसमुझ और राजन ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
एक परिवार पहले ही अपने जवान को खो चुका था। उसके बाद अंतिम यात्रा में जा रहे परिवार के चार लोगों की मौत ने पूरे इलाके को सदमे में डाल दिया। रुद्रपुर में चारों का अंतिम संस्कार एक साथ किया गया था।
अभी लोग संभल भी नहीं पाए थे कि फिर हुआ हादसा
पहली घटना के तीन दिन बाद 7 अक्टूबर की सुबह एक और भयावह हादसा सामने आया। इस बार लखनऊ से क्रिकेट प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर देवरिया लौट रहे युवा खिलाड़ियों की कार सुल्तानपुर क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गई।
हादसे में मईल क्षेत्र के इरफान उर्फ राज और नित्यानंद प्रजापति तथा लार क्षेत्र के अनिकेत सिंह और आनंद यादव की मौत हो गई। चारों युवा क्रिकेट से जुड़े थे और प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर अपने घर लौट रहे थे।
रिपोर्टों के अनुसार खिलाड़ी लगातार सफर और प्रतियोगिताओं में शामिल होने के कारण थकान और नींद की कमी से जूझ रहे थे। हालांकि हादसे का अंतिम कारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
तीन दिन में सात मौतों ने खड़े किए बड़े सवाल
दो हादसों में सात लोगों की मौत का आंकड़ा महज एक संख्या नहीं है। इसके पीछे सात परिवारों का ऐसा दर्द है जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
पहली घटना में एक सैनिक के पार्थिव शरीर को घर पहुंचाने वाला सफर ही परिवार के कई सदस्यों की जिंदगी का आखिरी सफर बन गया। दूसरी घटना में क्रिकेट के मैदान पर भविष्य बनाने का सपना देखने वाले चार युवाओं की जिंदगी सड़क पर खत्म हो गई।
लगातार हुए हादसों के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक्सप्रेसवे पर रात और भोर के समय वाहनों की निगरानी कितनी प्रभावी है। लंबे सफर के दौरान चालकों की थकान, नींद, तेज रफ्तार और सड़क पर खड़े या धीमी गति से चल रहे भारी वाहनों से जुड़े जोखिमों को लेकर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
क्या सिर्फ चालक की गलती मानकर खत्म हो जाएगा मामला?
सड़क हादसे के बाद अक्सर चालक की गलती, तेज रफ्तार या नींद को कारण माना जाता है। लेकिन एक्सप्रेसवे जैसी तेज रफ्तार वाली सड़क पर सुरक्षा कई स्तरों पर निर्भर करती है।
भारी वाहनों की सुरक्षित पार्किंग, रात में उनकी दृश्यता, पर्याप्त चेतावनी संकेत, गश्त, आपातकालीन प्रतिक्रिया और थके हुए चालकों की निगरानी जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है।
दोनों हादसों के वास्तविक कारण संबंधित जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे। इसलिए किसी एक कारण को अंतिम मान लेना जल्दबाजी होगी।
देवरिया के सात घरों में पसरा मातम
तीन दिन में सात लोगों की मौत ने देवरिया के कई गांवों को शोक में डुबो दिया है। जिन परिवारों में त्योहारों और भविष्य की तैयारियों की चर्चा होनी थी, वहां अब अपनों की याद में सन्नाटा है।
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे ने उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों के बीच सफर को आसान बनाया है, लेकिन लगातार सामने आ रहे गंभीर हादसे यह सवाल भी छोड़ रहे हैं कि तेज रफ्तार सफर को सुरक्षित बनाने के लिए और क्या कदम उठाए जाने चाहिए।
अब जरूरत हादसे के बाद केवल मुआवजे या संवेदना तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि उन कारणों की पड़ताल करने की है जिनसे एक ही मार्ग पर बार-बार जानें जा रही हैं।