भीखम छपरा हत्याकांड: हत्या के बाद खुली पुलिस की लापरवाही की परत, SHO समेत चार निलंबित

Deoria Murder Case: भीखम छपरा कांड में बड़ा Police Action, SHO समेत 4 पुलिसकर्मी Suspend

देवरिया। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के लार थाना क्षेत्र में सड़क पर ब्रेकर बनाने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सिर्फ एक हत्या का मामला नहीं रह गया है। भीखम छपरा गांव में आरएसएस कार्यकर्ता रामेश्वर तिवारी की पीट-पीटकर हत्या के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई है। परिजनों की ओर से स्थानीय पुलिस पर शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेने के आरोप लगाए गए। मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जांच के बाद थाना प्रभारी समेत चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया।

घटना के बाद वरिष्ठ अधिकारियों के गांव पहुंचने और पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई से एक बड़ा सवाल सामने आया है—अगर विवाद और शिकायतों को समय रहते गंभीरता से लिया गया होता तो क्या यह खूनी वारदात टाली जा सकती थी? इसका अंतिम जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा, लेकिन पुलिस विभाग की कार्रवाई ने स्थानीय स्तर पर बरती गई कथित लापरवाही को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

ब्रेकर को लेकर शुरू हुआ विवाद बना जानलेवा

भीखम छपरा गांव में सड़क निर्माण का काम चल रहा था। इसी दौरान सड़क पर ब्रेकर बनाए जाने को लेकर रामेश्वर तिवारी और दूसरे पक्ष के बीच विवाद हुआ। विवाद बढ़ने के बाद मारपीट शुरू हो गई। आरोप है कि रामेश्वर तिवारी पर लाठी-डंडों से हमला किया गया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए।

परिजन उन्हें इलाज के लिए लार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे। हालत गंभीर होने पर चिकित्सकों ने उन्हें आगे रेफर किया। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। घटना के बाद गांव में तनाव फैल गया और पुलिस बल तैनात करना पड़ा।

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हत्या से पहले की शिकायतें बनीं बड़ा सवाल

इस मामले में सबसे गंभीर सवाल पुलिस की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों में परिजनों के हवाले से बताया गया है कि मृतक और दूसरे पक्ष के बीच पहले भी विवाद रहा था और परिवार ने पुलिस से शिकायत किए जाने की बात कही है।

यहीं से पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा होता है। अगर किसी विवाद को लेकर पहले से शिकायतें मिल रही थीं, तो क्या दोनों पक्षों के बीच विवाद खत्म कराने और संभावित हिंसा रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाए गए थे? इस पहलू की जांच अब महत्वपूर्ण हो गई है।

हालांकि पूर्व शिकायतों की वास्तविक स्थिति, उन पर पुलिस ने क्या कार्रवाई की और किस स्तर पर चूक हुई—इन सवालों का आधिकारिक निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

शिकायत के बाद भी नहीं थमा विवाद, फिर चली लाठियां

परिवार की ओर से पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाए जाने के बाद मामला और गंभीर हो गया। पुलिस प्रशासन ने भी इसे सामान्य विवाद मानकर छोड़ने के बजाय थाना स्तर की भूमिका की जांच शुरू की।

जांच में प्रथम दृष्टया पुलिसकर्मियों की लापरवाही सामने आने के बाद लार के प्रभारी निरीक्षक राकेश कुमार सिंह, उपनिरीक्षक राममूरत और दो बीट कांस्टेबल चंद्रभान भारती तथा प्रीतम यादव को निलंबित कर दिया गया।

यानी हत्या के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के साथ-साथ पुलिस की अपनी भूमिका पर भी कार्रवाई हुई है। पुलिस विभाग के भीतर हुई यह कार्रवाई इस मामले को सामान्य आपराधिक घटना से आगे ले जाती है।

डीआईजी पहुंचे तो सामने आया पुलिस कार्रवाई का सवाल

घटना के बाद गोरखपुर रेंज के डीआईजी एस. चनप्पा भी भीखम छपरा पहुंचे। उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया और मृतक के परिजनों से मुलाकात की। परिजनों ने पुलिस की भूमिका को लेकर अपनी शिकायतें उनके सामने रखीं।

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डीआईजी ने अधिकारियों से घटना की जानकारी ली और आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए। गांव में तनाव को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस बल और पीएसी की तैनाती की गई है।

डीआईजी के स्तर पर घटनास्थल का निरीक्षण और उसके बाद पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई ने इस मामले में पुलिस की जवाबदेही को भी महत्वपूर्ण बना दिया है।

16 लोगों के खिलाफ मुकदमा, गिरफ्तारी के लिए टीमें

मृतक की पत्नी अमृता देवी की तहरीर पर पुलिस ने संजय तिवारी, दीपक तिवारी, प्रांजल तिवारी, अभिनीत तिवारी, आदित्य तिवारी और निखिल तिवारी समेत छह नामजद तथा 10 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।

आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की कई टीमें लगाई गई हैं। रिपोर्टों के अनुसार पुलिस ने अलग-अलग स्थानों पर दबिश भी दी, लेकिन आरोपी पुलिस की गिरफ्त में नहीं आए थे। तीन महिलाओं को हिरासत में लेकर पूछताछ किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।

अब दो मोर्चों पर जांच

इस मामले में पुलिस के सामने अब दो बड़ी जिम्मेदारियां हैं। पहली—हत्या के आरोपियों को गिरफ्तार कर घटना की पूरी कड़ी सामने लाना। दूसरी—यह पता लगाना कि घटना से पहले विवाद और शिकायतों को लेकर स्थानीय पुलिस ने क्या कदम उठाए थे।

चार पुलिसकर्मियों का निलंबन इस बात का संकेत है कि विभाग ने पुलिस की भूमिका को गंभीरता से लिया है। लेकिन असली सवाल अब भी यही है कि क्या समय रहते पुलिस हस्तक्षेप करती तो हिंसा को रोका जा सकता था?

इसका जवाब जांच की रिपोर्ट और पूर्व शिकायतों के रिकॉर्ड से सामने आएगा।

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कार्रवाई के बाद भी कई सवाल बाकी

भीखम छपरा की घटना ने कानून-व्यवस्था के साथ-साथ स्थानीय पुलिस की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े किए हैं। हत्या के बाद कार्रवाई होना जरूरी है, लेकिन विवाद बढ़ने से पहले पुलिस की सक्रियता उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है।

फिलहाल प्रशासन ने आरोपियों की गिरफ्तारी और निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया है। गांव में पुलिस बल तैनात है और मामले की जांच आगे बढ़ रही है। अब देखना यह है कि हत्या के आरोपियों की गिरफ्तारी कब तक होती है और पुलिस की कथित लापरवाही से जुड़े सवालों पर जांच में क्या निष्कर्ष सामने आता है।

भीखम छपरा की घटना ने एक स्थानीय विवाद को बड़े कानून-व्यवस्था के सवाल में बदल दिया है—जहां एक तरफ हत्या के आरोपियों पर कार्रवाई का इंतजार है, वहीं दूसरी तरफ पुलिस की भूमिका की जवाबदेही भी जांच के दायरे में है।

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