नारे वायरल हैं, सवाल गंभीर है: क्या महिला सुरक्षा की लड़ाई ‘मर्द बनाम औरत’ बनती जा रही है?
- एम. के. पाण्डेय ‘निल्को’ | संपादकीय | The Newswala
दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों सिर्फ प्रदर्शन नहीं हो रहा, बल्कि समाज के सामने एक बड़ा सवाल रखा जा रहा है—क्या महिलाएं वास्तव में सुरक्षित और स्वतंत्र हैं? दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं और अन्य महिलाओं के प्रदर्शनों में महिला सुरक्षा, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा और महिलाओं की स्वतंत्र आवाजाही को लेकर नारे लगाए जा रहे हैं। इन प्रदर्शनों के कुछ तुकबंदी वाले नारे सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए हैं।
“एक कचौड़ी, दो समोसा… इन मर्दों का क्या भरोसा”, “एक सुट्टा, दो चाय… मर्द जात हाय-हाय”, “शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में” और “नहीं डरेंगे डर के, मर्द को रखो घर में”—इन नारों ने महिला सुरक्षा के मुद्दे को सोशल मीडिया की बहस के केंद्र में ला दिया है। कुछ नारों में व्यंग्य है, कुछ में गुस्सा है और कुछ सीधे उस सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं जिसमें सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की आजादी सीमित किए जाने की शिकायत की जाती है। लेकिन यहीं से इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण और सबसे असहज बहस शुरू होती है।महिला सुरक्षा की मांग पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। किसी महिला के साथ अपराध होता है तो उसे न्याय मिलना चाहिए। अपराधी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। सार्वजनिक स्थान सुरक्षित होने चाहिए। पुलिस की मौजूदगी, स्ट्रीट लाइट, CCTV और प्रभावी शिकायत व्यवस्था जैसी बुनियादी सुविधाएं महिलाओं की सुरक्षा का हिस्सा हैं। प्रदर्शनों में इन मुद्दों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
प्रदर्शन का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि सुरक्षा के नाम पर लड़कियों की आजादी सीमित करने के बजाय अपराधियों और असुरक्षित सार्वजनिक स्थानों पर ध्यान दिया जाए। “रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं” जैसे नारों के जरिए प्रदर्शनकारी इसी सोच पर सवाल उठा रही हैं। अगर किसी लड़की को देर रात बाहर जाने से इसलिए रोका जाता है क्योंकि सड़क सुरक्षित नहीं है, तो असली सवाल लड़की से ज्यादा उस सड़क की सुरक्षा व्यवस्था पर होना चाहिए। अगर किसी महिला को कपड़ों, समय या स्थान के आधार पर अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है, तो समाज को अपनी सोच पर भी विचार करना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ एक और सवाल भी उतना ही जरूरी है—क्या कुछ अपराधियों के व्यवहार का जवाब पूरे पुरुष समाज के सामान्यीकरण से दिया जा सकता है? यहीं “मर्द जात हाय-हाय” जैसे नारे बहस को एक दूसरी दिशा में ले जाते हैं।एक अपराधी पुरुष हो सकता है, लेकिन हर पुरुष अपराधी नहीं है। जिस पिता ने अपनी बेटी को पढ़ाया है, जिस भाई ने अपनी बहन का साथ दिया है, जिस पति ने अपनी पत्नी के करियर और स्वतंत्रता का सम्मान किया है और जिस बेटे ने अपनी मां की जिम्मेदारी उठाई है—उसे किसी अपराधी के साथ एक ही श्रेणी में रखना क्या न्यायपूर्ण होगा? अपराधी की पहचान उसके अपराध से होनी चाहिए, उसके जेंडर से नहीं। यह बात महिलाओं की सुरक्षा की मांग को कमजोर नहीं करती। बल्कि इसे और स्पष्ट करती है। यदि समस्या यौन हिंसा है तो लड़ाई यौन हिंसा के खिलाफ होनी चाहिए। यदि समस्या अपराधियों की मानसिकता है तो सवाल अपराधी मानसिकता पर होना चाहिए। यदि समस्या पुलिस और न्याय व्यवस्था की कमजोरी है तो सवाल व्यवस्था से होना चाहिए। पूरे पुरुष समाज को निशाना बनाना समाधान नहीं है। दूसरी ओर, पुरुषों को भी यह समझना होगा कि इन नारों को सिर्फ “पुरुष विरोध” कहकर खारिज कर देना आसान रास्ता है। इन नारों के पीछे महिलाओं के भीतर मौजूद वास्तविक असुरक्षा, गुस्सा और लंबे समय से चली आ रही शिकायतें भी हैं। प्रदर्शन के पीछे कथित तौर पर आस्था कुंज पार्क, कालकाजी में 17 वर्षीय लड़की के साथ गैंगरेप की घटना का संदर्भ भी बताया गया है।
इसलिए पुरुष समाज को भी यह सवाल पूछना चाहिए कि हमारे आसपास महिलाओं के साथ होने वाले अनुचित व्यवहार को रोकने के लिए हम क्या कर रहे हैं? क्या किसी दोस्त द्वारा लड़की पर अभद्र टिप्पणी करने पर हम उसे रोकते हैं? क्या हम महिलाओं की “ना” को सचमुच “ना” मानना सिखाते हैं? क्या हम अपने बेटों को सिर्फ यह बताते हैं कि “बाहर मत जाना”, या यह भी बताते हैं कि “किसी की सीमा और सहमति का सम्मान करना”? सुरक्षित समाज सिर्फ कानून से नहीं बनता। घर, स्कूल, कॉलेज, दोस्ती और सामाजिक व्यवहार—सब मिलकर समाज की मानसिकता बनाते हैं। लेकिन न्याय की दूसरी शर्त भी उतनी ही महत्वपूर्ण है—आरोप और अपराध में अंतर।किसी पर आरोप लगना और अदालत में अपराध सिद्ध होना दो अलग बातें हैं। इसलिए महिला की शिकायत को गंभीरता से लेना जरूरी है, लेकिन निष्पक्ष जांच और कानून की प्रक्रिया को भी उतना ही महत्व देना चाहिए। न्याय व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ दोषी को दंड देना नहीं, बल्कि निर्दोष को गलत दंड से बचाना भी है।
सोशल मीडिया ने इस पूरे आंदोलन को एक नया चेहरा दे दिया है। “एक कचौड़ी, दो समोसा…” जैसे नारे गंभीर मुद्दे को मीम और तुकबंदी की भाषा में लाखों लोगों तक पहुंचा रहे हैं। यही कारण है कि प्रदर्शन की बात कॉलेज परिसर से निकलकर सोशल मीडिया की बहस बन गई है। लेकिन वायरल होना और समाधान होना—दो अलग चीजें हैं। नारे ध्यान खींच सकते हैं, लेकिन व्यवस्था नहीं बदलते। व्यवस्था तब बदलेगी जब शिकायत पर कार्रवाई होगी, जांच निष्पक्ष होगी, सार्वजनिक स्थान सुरक्षित होंगे, न्याय समय पर मिलेगा और समाज बच्चों को बचपन से ही सम्मान, सहमति और जिम्मेदारी का अर्थ समझाएगा। हर पुरुष को इन नारों से सहमत होना जरूरी नहीं। लेकिन हर पुरुष को यह जरूर सोचना चाहिए कि महिलाएं आखिर किस डर और अनुभव के कारण सड़कों पर उतरने को मजबूर महसूस कर रही हैं। उसी तरह महिलाओं की आवाज सुनने का अर्थ यह भी नहीं कि हर पुरुष को सामूहिक रूप से दोषी मान लिया जाए। महिला की सुरक्षा और पुरुष की गरिमा—दोनों एक साथ सुरक्षित रह सकते हैं। हमें “मर्द बनाम औरत” की बहस से आगे बढ़ना होगा।लड़ाई पुरुष और महिला के बीच नहीं होनी चाहिए। लड़ाई अपराध और अन्याय के खिलाफ होनी चाहिए।
बलात्कारी को सजा मिले।
अपराधी को सजा मिले।
पीड़िता को न्याय मिले।
और निर्दोष को झूठे आरोप से सुरक्षा मिले।
यही वह संतुलन है जहां से एक सभ्य समाज की शुरुआत होती है। क्योंकि अंत में सवाल यह नहीं है कि मर्द कौन है और औरत कौन। सवाल यह है कि— गलत कौन है, पीड़ित कौन है और न्याय किसे मिलना चाहिए? और शायद आज के पूरे विवाद का सबसे जरूरी निष्कर्ष यही है—“महिलाओं को डराकर सुरक्षित समाज नहीं बनाया जा सकता, और पुरुषों को सामूहिक रूप से दोषी ठहराकर भी न्यायपूर्ण समाज नहीं बनाया जा सकता| न्याय व्यक्ति के कर्म से तय होना चाहिए, उसके जेंडर से नहीं।
– एम. के. पाण्डेय ‘निल्को’