एक भारत, अनेक अनुभव: मेरी यात्रा की कहानी
कहा जाता है कि जीवन स्वयं एक यात्रा है। जन्म से मृत्यु तक, मनुष्य लगातार किसी न किसी रूप में यात्रा करता रहता है। यदि राजकुमार सिद्धार्थ नगर भ्रमण पर न निकलते, तो गौतम बुद्ध न बनते। श्रीराम वनवास और दक्षिण की यात्रा न करते, तो धर्म पर अधर्म की विजय की गाथा अधूरी रह जाती।
क्रिस्टोफर कोलंबस, मार्को पोलो, इब्न बतूता, ह्वेन त्सांग, राहुल सांस्कृतायन जैसे महान यात्री न होते, तो दुनिया उतनी विस्तृत और ज्ञात न होती। यात्रा केवल स्थानांतरण नहीं, बल्कि अनुभव, ज्ञान, सहिष्णुता और संस्कृतियों के आदान-प्रदान का माध्यम है। यह हमारे दृष्टिकोण को विस्तारित करती है, जीवन को गहराई से समझने का अवसर देती है।
भारत की विविधता और एकता को अनुभव करने की मेरी जिज्ञासा ने मुझे ग्रामीण परिवेश से लेकर सांस्कृतिक पर्वों तक ले गया। वर्ष 2012 से कृषि क्षेत्र में कार्य करते हुए मुझे देश के अनेक राज्यों — विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में जाने का अवसर मिला। वहाँ के किसानों, स्थानीय लोगों से मेलजोल और साथ काम करने से गहरे अनुभव प्राप्त हुए। दक्षिण भारत में ओणम, पोंगल, उगादी, करागा, दशहरा जैसे पर्वों में भाग लेना और स्थानीय खानपान को अपनाना जीवन के अविस्मरणीय अनुभवों में शामिल हैं। उत्तर-पूर्व भारत में नागालैंड, असम, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में प्रवास और कार्य ने वहाँ की जनजातीय परंपराओं, त्योहारों और जीवनशैली को समझने का अवसर दिया। नागालैंड का हॉर्नबिल फेस्टिवल, असम का बिहू, मणिपुर का संगाई और कंग फेस्टिवल, मेघालय की मातृसत्तात्मक परंपरा, और सिक्किम की स्वच्छता व जैविक खेती — सभी ने मेरे अनुभवों को समृद्ध किया।
यात्राओं के दौरान यह अनुभव हुआ कि भाषा संवाद का साधन अवश्य है, किंतु व्यवहार और भावनाएँ उससे कहीं अधिक प्रभावशाली हैं। दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्व भारत की भाषाएँ न जानते हुए भी वहाँ के लोगों से गहरे संबंध बन सके। इन यात्राओं में ट्रेन, बस, टैक्सी और कभी-कभी पैदल भी सफर करना पड़ा। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में रहना और काम करना चुनौतीपूर्ण परंतु अत्यंत रोचक रहा। रेल यात्रा के दौरान जनरल से लेकर एसी कोच तक में सफर किया, हर वर्ग के लोगों को करीब से देखा और महसूस किया। कभी फर्श पर बैठे हँसते परिवारों से सीख मिली, तो कभी वैभव में डूबे असंतुष्ट लोगों से जीवन का विरोधाभास समझ में आया।
यात्राओं ने मुझे समाज की असमानताओं को समझने का अवसर दिया। दिखावे की संस्कृति ने त्योहारों को आमजन से दूर कर दिया है। वहीं मेहनतकश और ईमानदार लोग समाज में उपेक्षित हैं। इन अनुभवों ने मुझे आंतरिक रूप से संवेदनशील और जागरूक बनाया। यात्रा केवल गंतव्य तक पहुँचना नहीं, बल्कि स्वयं को जानना, समाज को समझना और जीवन की असलियतों से परिचित होना है। यह हमें विनम्र बनाती है, अहंकार से मुक्त करती है और देश-समाज के प्रति दायित्व का बोध कराती है।
श्याम नंदन पाण्डेय मनकापुर, गोण्डा, उत्तर प्रदेश
मो.: 8005421381, 7012915223