मासूम लाशों का जिम्मेदार कौन?

झालावाड़, राजस्थान | पिपलोदी गांव में एक सरकारी स्कूल की छत गिरने से 7 मासूम बच्चों की मौत और 28 से अधिक बच्चों के घायल होने की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। लेकिन यह केवल एक दुर्घटना नहीं है — यह सरकारी तंत्र की लापरवाही और संवेदनहीनता से उपजा हत्याकांड है। यह उन बच्चों की हत्या है जिन्हें शिक्षा के नाम पर सरकारी खंडहरों में बैठा दिया गया और जिनकी जान की कीमत सिर्फ एक मुआवजे में तय कर दी गई।

जानकारी के अनुसार, स्कूल भवन की मरम्मत के लिए ₹4.28 करोड़ का बजट पास किया गया था। मगर वह फाइल वित्त विभाग की धूल में दब गई। बजट कागजों पर था, लेकिन जमीन पर नहीं। और जब तक बजट ज़मीन पर उतरता, तब तक छत जमीन पर गिर चुकी थी — मासूम बच्चों के साथ। चश्मदीद बच्चों ने बताया कि छत से टुकड़े गिर रहे थे, और उन्होंने शिक्षकों को आगाह भी किया। जवाब मिला — “कुछ नहीं होगा, बैठो!” यही रवैया इस पूरे सिस्टम का है। जब तक जान ना जाए, तब तक कोई नहीं सुनता। यह सिर्फ शिक्षकों की लापरवाही नहीं, यह पूरे प्रशासन की नाकामी है।

जिम्मेदार कौन? और सजा किसे?

  • क्या सिर्फ 5 शिक्षकों को निलंबित कर देने से जवाबदेही तय हो जाती है?

  • क्या नेताओं के शोक ट्वीट इस त्रासदी का समाधान हैं?

  • क्या मुआवजे की राशि मासूमों की जान की भरपाई कर सकती है?

हर बार की तरह जांच बैठा दी गई है, लेकिन जनता जानती है कि इन जांचों का अंजाम क्या होता है — ‘फाइल बंद, मामला खत्म।’

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जब चुनाव आते हैं तो हर गांव में स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षा की बातें होती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि गांवों के स्कूल मौत के कुएँ बने हुए हैं, जहाँ बैठकर पढ़ना नहीं, बचना सीखना पड़ता है। जब तक अफसरों पर हत्या के मुकदमे दर्ज नहीं होंगे, जब तक स्कूल भवनों का ऑडिट ईमानदारी से नहीं होगा, और जब तक राजनेताओं की जवाबदेही तय नहीं होगी — तब तक यही होता रहेगा। इन लाशों पर सिर्फ पुष्प चढ़ाने से कुछ नहीं होगा, अब ज़रूरत है कठोर व्यवस्था परिवर्तन की।

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एम. के. पांडेय

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