काशी के महाश्मशान में नगर वधुओं का नृत्य: बाबा मसाननाथ से मांगी कलंकित जीवन से मुक्ति
वाराणसी, उत्तर प्रदेश – 5 अप्रैल 2025 काशी के मणिकर्णिका घाट पर एक अनोखी और 400 साल से भी पुरानी परंपरा ने फिर से सुर्खियां बटोरीं। शुक्रवार की रात, चैत्र नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर, धधकती चिताओं के बीच नगर वधुओं ने बाबा मसाननाथ के दरबार में नृत्य और भजन प्रस्तुत किए। यह आयोजन हर साल की तरह इस बार भी जीवन और मृत्यु के अनूठे संगम का प्रतीक बना, जहां एक ओर चिताओं की आग जल रही थी, वहीं दूसरी ओर घुंघरुओं की झंकार और भक्ति भजनों की स्वरलहरियां गूंज रही थीं।
मणिकर्णिका घाट, जिसे काशी का महाश्मशान कहा जाता है, वह स्थान है जहां साल भर चिताएं जलती रहती हैं। मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार से जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी पवित्र स्थल पर नवरात्रि की सप्तमी को नगर वधुएं देश भर से स्वतः आती हैं और बाबा मसाननाथ—जिन्हें भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है—के सामने अपनी कला अर्पित करती हैं। इस बार भी, नगर वधुओं ने “दुर्गा दुर्गति नाशिनी” और “डिमिग डिमिग डमरू कर बाजे” जैसे भजनों के साथ नृत्य प्रस्तुत किया, जिसमें उनकी प्रार्थना साफ झलक रही थी—“हे बाबा, इस कलंकित जीवन से मुक्ति दें, अगले जन्म में हमें यह दंश न सहना पड़े।”
इस परंपरा की शुरुआत 16वीं शताब्दी में मानी जाती है, जब राजा मानसिंह ने मसाननाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। उस समय मंदिर में संगीत और नृत्य के लिए कोई कलाकार तैयार नहीं हुआ, क्योंकि यह श्मशान क्षेत्र था। तब नगर वधुओं ने आगे बढ़कर यह जिम्मेदारी ली और बाबा को अपनी कला से रिझाने का संकल्प लिया। तभी से यह सिलसिला अनवरत जारी है। नगर वधुओं का मानना है कि बाबा की आराधना से उन्हें अपने इस जीवन के पापों से मुक्ति मिलेगी और अगला जन्म बेहतर होगा।
शुक्रवार रात बाबा मसाननाथ का दरबार फूलों से सजाया गया। गुलाब, चमेली, और रजनीगंधा की महक के बीच भव्य आरती हुई और फिर मंच पर नगर वधुओं की प्रस्तुति शुरू हुई। जलती चिताओं की तपिश के बीच उनकी घुंघरुओं की आवाज और भावपूर्ण भजन हर किसी को मंत्रमुग्ध कर रहे थे। यह दृश्य काशी की उस संस्कृति को दर्शाता है, जहां मृत्यु को भी उत्सव की तरह देखा जाता है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने रात भर इस आयोजन का आनंद लिया, जो सुबह तक चला।
इस आयोजन का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें नगर वधुएं नृत्य करती और भजन गाती नजर आ रही हैं। उनकी आंखों में उम्मीद और प्रार्थना साफ दिखती है। यह परंपरा न केवल काशी की सांस्कृतिक विविधता को उजागर करती है, बल्कि यह भी संदेश देती है कि मोक्ष की इस नगरी में हर जीवन का सम्मान है।
काशी की यह रहस्यमयी रात न सिर्फ आध्यात्मिकता का प्रतीक है, बल्कि मानवीय भावनाओं और आकांक्षाओं का एक जीवंत चित्रण भी है।