उत्तर प्रदेश में भाजपा तब से अबतक
अंकित मिश्रा, लखनऊ । जनमत लोकतंत्र की बुनियाद है क्युकि लोगों की सहमती पर ही राजसत्ता का निर्माण होता है. मगर लोगों की राय भी हमेशा एक सी नहीं रहती है.
अखंड भारत के राजनीतिक इतिहास में एक लेख बहुत ही सामान्य है – “देश की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर ही गुजरता है”. जनसंख्या और पहले क्षेत्रफल के हिसाब से भी देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में राजनीतिक स्थिरता कभी नहीं रही. आज भारतीय जनता पार्टी जो कि भारत की नहीं विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है उसके लिए उत्तर प्रदेश को पूर्ण बहुमत से जितने के लिए कई बार रणनीति बनानी पडी.
भारतीय जन संघ (बीजेएस), भाजपा के पूर्ववर्ती, उत्तर प्रदेश में 1960 और 70 के दशक में मुख्य विपक्षी दलों में से एक के रूप में उभरा. 1969 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 98 सीटें जीती थीं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक राजनीतिक शाखा होने के कारण, इसकी विचारधारा मूल रूप से मूल संगठन से ली गई थी. 1977 में, बीजेएस ने जनता पार्टी बनाने के लिए चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल के साथ हाथ मिलाया, जिसने 425 सीटों वाली विधानसभा में 352 सीटें जीतीं.
भाजपा(1980-89) हिंदू राष्ट्रवाद,राम मंदिर आंदोलन और अडवाणी रथ यात्रा.
1977 के चुनावों के बाद, जनता पार्टी बिखर गई और उसके एक सदस्य दल, भारतीय जनसंघ ने 1980 में भाजपा का गठन किया. उत्तर प्रदेश में भाजपा की शुरुआत मामूली थी, उसने 425 सीटों वाली विधानसभा में 11 सीटों पर जीत हासिल की. हालाँकि, पार्टी का समर्थन आधार बढ़ता गया क्योंकि इसने विश्व हिंदू परिषद और अन्य हिंदू राष्ट्रवादी समूहों द्वारा शुरू किए गए राम जन्मभूमि आंदोलन के साथ खुद को पूरी तरह से जोड़ लिया.
1989 से 2000
24 जून 1991 को सूबे में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार बनी थी, लेकिन तब करीब डेढ़ साल ही चल सकी थी. इससे पहले सिवाय कांग्रेस के संपूर्णानंद के, किसी भी मुख्यमंत्री ने पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया था.कल्याण सिंह एक साल, 165 दिन ही मुख्यमंत्री रह सके. क्योंकि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद कांड हुआ. बाबरी मस्जिद विध्वंस की खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई और उसी दिन राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था.
5 साल-3 मुख्यमंत्री
मुलायम सिंह भी सीएम का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके और डेढ़ साल में ही बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की नेता मायावती ने तख्ता पलट कर दिया. लेकिन, खुद मायावती भी साढ़े चार महीने ही सीएम रह सकीं और फिर राज्य में 1995 में राष्ट्रपति शासन लगा. पहली बार राज्य की सत्ता तक पहुंचने के बाद भाजपा को दोबारा कुर्सी पाने में करीब पांच साल लगे.
दूसरी बार 1997 में तेरहवीं विधानसभा में भाजपा राज्य की सत्ता में आई और कल्याण सिंह फिर मुख्यमंत्री बने. इस बार भाजपा ने पांच साल तक राज्य में सरकार तो चलाई लेकिन भाजपा के अंदर स्थिरता न होने के कारण इन पांच सालों में तीन मुख्यमंत्री रहे. कल्याण सिंह के बाद राम प्रकाश गुप्ता और फिर राजनाथ सिंह भाजपा सरकार के सीएम रहे.
सपा और बसपा ने भाजपा को पछाड़ दिया(2002-2014)
राजनाथ सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने सत्ता खो दी. इसके बाद राष्ट्रपति शासन का दौर चला. जब चुनाव हुए, तो बसपा भाजपा के समर्थन से सत्ता में लौट आई. हालांकि, गठबंधन, पहले की तरह, नहीं टिक पाया और केवल 16 महीने तक चला. अगले दो विधानसभा चुनावों में, भाजपा ने खुद को राज्य में तीसरे स्थान पर खिसका दिया क्योंकि बसपा और सपा ने शीर्ष स्थान के लिए संघर्ष किया. एनडीए सरकार गिरने के बाद बीजेपी का जनाधार कमजोर हुआ. दो मुख्य क्षेत्रीय दल – बसपा और सपा, भाजपा के मूल मतदाता आधार को तोड़कर बहुमत की सरकार बनाने में सक्षम थे. इसलिए, 2012 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर घटकर 15% रह गया.
खत्म हुआ 15 सालों का इंतज़ार सत्ता में दुबारा आई भाजपा सरकार
‘मोदी लहर’ का सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश में महसूस किया गया.राज्य ने 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 80 में से 71 सीटों पर भारी जीत हासिल करने में मदद की थी. तब समाजवादी पार्टी को शायद ये आभास होगया था कि आने वाले तीन साल में भाजपा ही विधानसभा चुनाव जीत सकती है और फिर 2017 में, बीजेपी ने 312 सीटें हासिल कीं और मुख्यमंत्री बने आदित्यनाथ योगी-उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में किसी पार्टी द्वारा जीती गई सीटों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या.