मरीज़ को क्लाइंट बनाने का खेल!

शंभूनाथ शुक्ल

इस कोरोना काल में जितने लोग भय और ख़ुद की लापरवाही से मरे, उससे कहीं अधिक कारपोरेट अस्पतालों ने मार दिए। लेकिन उनको सात खून माफ़ हैं। हमारी सरकारें ख़ुद न तो अस्पताल खुलवा सकती हैं न अच्छे शिक्षा संस्थान खड़े कर सकती हैं, वे सिर्फ़ इस अस्पताल माफिया को लूटने की खुली छूट दे सकती हैं। अगर गांव, क़स्बा और छोटे-बड़े शहर में अस्पताल होते, चिकित्सक होते और पैरा मेडिकल स्टाफ़ होता तो लोग यूँ नहीं पटापट मर रहे होते। यह किसी विशेष सरकार की बात नहीं बल्कि आज़ादी के बाद से ही सरकारों ने कभी इन मूलभूत सुविधाओं के बारे में नहीं सोचा। उदारीकरण के दौर में यह लूट और भयानक होती गई। दरअसल अस्पताल, स्कूल और चिकित्सक हमारे यहाँ लाभ का पेशा बन गया है। इसलिए सारी नैतिकता ताक पर रख कर ये पेशेवर लोग कमाई में जुटे हैं। मेडिकल प्रोफ़ेशन में यदि सेवा, करुणा और दया की भावना होती तो यह सब नहीं होता।
लेकिन चिकित्सकों को इसके लिए दोषी ठहराना उचित नहीं। क्योंकि जब वे एक करोड़ के आसपास खर्च कर मेडिकल की डिग्री ले कर निकलते हैं, तब उनके दिमाग़ में पहले तो इस धन को वसूलने की उत्कंठा होती है। और इसके लिए वे हर तरह का धतकरम करने को विवश होते हैं। दूसरे जब ये निजी और कारपोरेट अस्पताल उन्हें प्रति वर्ष करोड़ों का पैकेज देते हैं, तब वे उन चिकित्सकों को बाध्य करते हैं कि वे बीमारी को बड़ा करके बताएँ। एक साधारण चीरा लगाने के लिए भी ये अस्पताल हज़ारों रुपए के टेस्ट कराते हैं और उसके बाद भी मरीज़ को बचा नहीं पाते।
एक पुरानी कथा है। एक वैद्य जी की वैद्यकी जब अपने इलाके में नहीं चली तो उन्होंने दूसरे शहर जाने की ठानी। वे चले और उस शहर में पहुँच कर अपने एक पुराने दोस्त सेठ जी के यहाँ डेरा डाला। सेठ जी उस समय थे नहीं तो सेठानी ने उन्हें भोजन कराया और रात बिताने के लिए उन्हें मेहमानों के कमरे में भेज दिया। देर रात जब सेठ जी लौटे तो सेठानी ने उनके लिए भोजन लगाया। अचानक वैद्य जी के कानों में एक तेज आवाज़ गूंजी। सेठ जी सेठानी को डांट कर कह रहे थे- ‘अरे तूने खाने में दही नहीं परोसा?’ वैद्य जी सेठ जी की यह मांग सुनकर अपनी पत्नी से बोले कि अबकी जाड़ों में तुझे सोने का हार दिलवाऊंगा। मगर तभी फिर सेठ जी की आवाज़ उन्हें सुनाई पड़ी- ‘सेठानी तेरा दिमाग कहाँ है, शाम को दही परोसा और भुना हुआ जीरा डालना भूल गई।’ यह सुनते ही वैद्य जी अपनी पत्नी से बोले- “हार कैंसिल. जो आदमी शाम को दही जीरे के साथ लेगा उसे बीमारी होने से रही।” अब इसका एक मतलब तो यह है कि रात को दही नहीं खाना चाहिए और अगर खाया जाए तो उसमें भुना हुआ जीरा डालना अनिवार्य ह। मगर इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि वैद्य अथवा डाक्टर के लिए दोस्ती का कोई मतलब नहीं उन्हें हर बीमार अपना क्लाइंट नज़र आता है जिससे वे दवा के बदले पैसा उगाह सकते हैं।
इसीलिए लोग कहते हैं कि जिस मौसम में बीमारियाँ बढ़ती हैं वही मौसम डाक्टरों के लिए सबसे ज्यादा मुफीद होता है। क्योंकि वही मौसम डाक्टरों की जेबें भरता है। दुःख है कि कुछ डाक्टरों ने अपनी हरकत से अपनी यही छवि बनाई हुई है। और इसका खामियाजा उन अच्छे डाक्टरों को भी भुगतना पड़ता है जो एक मिशन के लिए डाक्टरी कर रहे हैं। चिकित्सा एक व्यवसाय नहीं एक सेवा है। एक डाक्टर अपने ज्ञान और कौशल से मरीज़ को आराम पहुंचाता है, उसे असह्य पीड़ा से मुक्ति दिलाता है, उसे आकस्मिक मृत्यु से बचाता है। मगर ऐसे व्यवसाय को कुछ लोगों ने गन्दा कर दिया है। आज डॉक्टर अपने मरीज को उसकी माली हालत को देखकर ही ट्रीट करता है क्योंकि उसे पूरा भरोसा है कि जब उसे ही क्योर करना है तो अगर वह ऊपर वाला चाहेगा तो यह मरीज क्योर हो जाएगा फिलहाल तो मेरा काम इसकी जेब खाली कराना है। यही कारण है कि इलाज के लिए अब नब्ज नहीं बल्कि जेब देखी जाती है और जेब के अनुसार ही इलाज होता है। तमाम तरह के टेस्ट और टेस्ट के बाद एडवांस टेस्ट तो यही कहानी कहते हैं। हालांकि इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि इन पैथॉलाजी टेस्ट से मरीज के रोग का सही-सही इलाज करना आसान हो गया है लेकिन अगर डॉक्टर अनुभवी है तो वह रोग को तत्काल पकड़ लेगा और अगर बहुत जटिल हुआ तो एकाध टेस्ट से ही वह रोग को समझ लेगा। मगर आज डॉक्टर फालतू में ही इतने टेस्ट करा देगा कि रोगी का दम तो वैसे ही फूलने लगेगा। यही नहीं सारे टेस्ट भी और अल्ट्रासाउंड भी। संभव है कि डॉक्टर इसके बाद भी रोग न पकड़ पाए और विशेषज्ञों की एक बैठक बुलवाए, उसका खर्च भी मरीज देगा। एक सामान्य बुखार के लिए आज डॉक्टर्स राजरोग की तरह इलाज करते हैं नतीजन एक गरीब आदमी तो इलाज करा ही नहीं पाता और बिना इलाज के बेचारे को मरना पड़ता है।
आमतौर पर मौसम बदलने के चलते प्रकृति और वातावरण में कई तरह के परिवर्तन होते हैं. इनकी वजह से कुछ मौसमी बीमारियां आम हो गई हैं। मलेरिया, टायफायड और बदहजमी की समस्या इसके कारण ही पैदा होती है। लेकिन मजा देखिए आज तक देश के डॉक्टरों ने ऐसा कोई टीका नहीं ईजाद किया जो मलेरिया को जड़ से हटा दे। मलेरिया के तमाम रूप उलटे हर साल नए-नए नाम से आ जाते हैं। डेंगू, चिकेनगुनिया, बर्ड फ्लू आदि बीमारियां ऐसे ही बैक्टीरिया से पनपती हैं। मौसम गुजरने के बाद इनका कहर कम होने लगता है तो डॉक्टर और सरकार सब बेखबर हो जाते हैं कि अगले साल ये बीमारियां फिर आएंगी तब सोचा जाएगा। अगर मलेरिया का टीका ईजाद कर लिया गया होता तो बहुत-सी बीमारियां जड़ से खत्म हो चुकी होतीं। इसी तरह अगर पीने के पानी की शुद्घता पर ध्यान दिया गया होता तो टायफायड से लेकर यूटीआई व किडनी के रोगों पर काबू पा लिया गया होता। मगर हुआ उलटा यहां न तो नई दवाओं को ईजाद करने पर जोर दिया गया न ही खान-पान की शुद्घता पर नतीजा सामने है कि हर पांच भारतीय में से एक या तो मधुमेह का शिकार है अथवा रक्तचाप का या पेट जनित बीमारियों का। जब मरीज आया तो उसके रोग को धीमा कर दो, डॉक्टरों का बस यही फंडा रहता है। अंगों का प्रत्यार्पण कोई इलाज नहीं है क्योंकि यह सुविधा उसे ही मिल सकती है जो इसका खर्च उठा सकता है और डॉक्टरों की चौकड़ी में शामिल होने की ताकत रखे।
कोरोना के दौर में भी यही हुआ। सैकड़ों टेस्ट और उसके बाद मरीज़ को वेंटिलेटर पर रखना। इस चक्कर में मरीज़ तो बेचारा बेमौत मारा जाएगा। जो सक्षम हैं, उन्हें आईसीयू भी मिला और आक्सीजन भी लेकिन गरीब आदमी को तो चिता तक नहीं नसीब हुई। अगर सरकार मेडिकल शिक्षा को फ़्री कर दे और अस्पतालों का सरकारीकरण तो मरीज़ यूँ तड़पते हुए नहीं मारेंगे। लेकिन इसके लिए मज़बूत इच्छा शक्ति चाहिए, जो आज किसी राजनीतिक दल और नेता के पास नहीं है। उनके लिए आदमी एक वोटर है और डॉक्टर तथा अस्पताल के लिए एक क्लाइंट।

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है वो ये उनके निजी विचार हैं)

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