मन की बात : ई प्रधानी के चुनाव ह!

रोज़गार की तलाश कर रहे उत्तर प्रदेश के युवाओं को नौकरी के ऑफ़र भले ही कोई नेता न दिला सकें लेकिन मुर्गा और शराब के ऑफ़र आजकल बहुत आ रहे हैं। प्रधानी के चुनाव जो होने जा रहें हैं ।  

देश के कर्णधारों ने कभी सत्ता के विकेंद्रीकरण का स्वप्न देखा था और ग्राम स्तर तक सरकार को पहुचाने के लिए ग्राम पंचायत की व्यवस्था की थी, आज  के तहत उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत चुनाव का महाउत्सव चल रहा है। हर व्यक्ति इसमें अपनी भागीदारी देने को तत्पर है। ख़ुद को ‘नेता’ नहीं ‘बेटा’, ‘समाजसेवी’ और ‘कर्मठ उम्मीदवार’ बता कर गाँव में हर किसी के घर बिना मतलब हालचाल लेने पहुँच रहे हैं गाँव के लोगों को अपना चेहरा याद करवा रहे हैं।

हमारे यहाँ प्रधानी चुनाव का लोग बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। और जैसे ही चुनाव का ऐलान होता है ऐसे कई लोग हैं जो  महीनों तक घर की चाय,नाश्ता और भोजन देखते तक नहीं। ये अलग अलग प्रत्याशी से अलग अलग चौराहे पर अलग अलग तरह का नाश्ता करते हैं और ग़लती से कभी दूसरे प्रत्याशी ने किसी अन्य का नाश्ता करते पकड़ लिया तो उससे कहते हैं कि ‘अरे वोट तो तुमको ही देंगे, उससे तो बस अंदर का माहौल ले रहा था कि कितनी वोट है उसकी।’ और जो प्रधान के प्रत्याशी है वो बहुत साफ दिल के हैं जो लोग उनके दरवाजे तक नहीं जा पाते तो कच्ची, अँग्रेजी, मीट न जाने क्या क्या होम डिलिवरी करवा देते हैं।



चुनाव के ऐलान के बाद तो चौराहे पर जाने के लिए सोचना पड़ता है कि कहीं राह चलते कोई चाय नाश्ता न करा दे। एक बार मैंने एक भावी प्रधान को मना कर दिया तो वो नाराज़ होकर बोला- लगता है आप हमें वोट नहीं देंगे, नहीं तो चाय के लिए मना नहीं करते। इतने में मेरे साथ में गए एक चुनावजीवी व्यक्ति ने तुरंत कहा- अरे ऐसी बात नहीं है, चाय क्या समोसा भी खा लेंगे। समोसा का नाम सुनते ही प्रत्याशी का मुँह फक्क हो गया कि साला चाय के ख़र्चे में निपटा रहा था लेकिन अब समोसा भी खिलाना पड़ेगा। ख़ैर! अभी प्रचार जारी है और उनके जीतने की उम्मीद भी ।

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एम के निल्को (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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