किसे जामवंत चाहिए – प्रकाश मिश्रा

अपनी शक्ति भूले हनुमान जी को जामवंत जी ने शक्ति याद दिलाई और वह समुन्द्र पार कर लंका पहुंच ग‌ए। शक्ति भूलने का अभिशाप हम मानवों पर भी उसी अनुपात में प्राप्त है इसीलिए लगभग सभी को जामवंत की जरुरत होती है।

हमारा विवेक जब स्वस्थ्य रहता है तो हम स्वयं के जामवंत बन जाते हैं पर दिक्कत ये है इस ‘चार जी-पाँच जी’ वाले युग में हमपर इतनी फाइलें लदी रहती हैं कि विवेक कहीं दब सा जाता है और इस दबे हुए विवेक का जागृत होना कई बार बड़ा श्रमसाध्य हो जाता है या फिर हम भूल जाते हैं कि विवेक हमारे भीतर भी है, जिससे हम पुन: अपनी शक्तियों को याद कर पाएं।

विवेक जागृत करने की क्रिया फौरी तौर पर पीछे लौटना लगता है, ज्ञान समेटने की तृष्णा में ‘कुछ छुट ना जाए’ की चिन्ता बनी रहती है।

प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनी ज्यादातर एकान्त में रहते, ध्यान करते और दूर वनों में, कन्दराओं में रहते थे। साथ ही ज्ञान तक वह नहींं जाते थे बल्कि ज्ञान उनतक आता था क्योंकि वह स्वयं में जागृत थे।

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जागृत हम भी हैं पर कभी-कभार के लिए.. जागृत अवस्था की निरन्तरता चाहिए और वह आयेगा ‘स्वयं से’। नियमित स्वयं को जीना होगा और दिन में भी कुछ-कुछ अन्तराल पर स्वयं को याद करना होगा।

स्वामी विवेकानंद जी ने ‘आत्म-साक्षात्कार’ को सभी गुणों का मूल माना है यानी आँखें खोल या बन्द करके स्वयं का निरिक्षण करना। अपने-आप को देखना। अपने कार्यो को देखना। इसी शान्त अवस्था में उत्पन्न हुए अपनी सोच और विचारों को बाहर आने देना ही विवेक का जागृत होना है।

जामवंत रुपी विवेक के जागृत होने से ही हमारे भीतर के हनुमान अपनी शक्ति के साथ जागृत अवस्था में जी पायेंगे और यह हमें नियमित करना है और स्वयं को थोड़े-थोडे़ अन्तराल पर

 

  • प्रकाशवाणी

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