भोजपुरी व्यंग्य – “देवरिया में बा-बा”
देवरिया उपचुनाव पर एगो भोजपुरी व्यंग्य। जातिवाद की जहर में झौसाईल प्रमुख राजीनीतिक दल अपनी अपनी ओर से पण्डित उम्मीदवार उतरले हवें। फैसला जनता की हाथ में बा, लेकिन एगो सवाल त बड़ले बा-काहें पंडित ही उतारल गईले?
“देवरिया में बा-बा”
कहेली गोरी , देवरिया में का बा?
जातिवाद केतना, देवरिया में बाबा।
देखलीं उपचुनाव में, अझुराईल देवरिया।
गुलदस्ता की स्वागत से, मुरझाईल देवरिया।।
थुक्का-फजीहत केस, अवरी मुकदमा।
के अच्छा के बाउर, बुझाइल देवरिया?
हाथे से हाथ टकराईल का बा?
जातिवाद केतना, देवरिया में बाबा।।
मनुवादी के जे देत रहे गारी।
सबसे पहिले उहे पण्डित उतारी।।
सियासी अखाड़ा में उतरल जब हाथी।
उहो बनवले बा, बाभने के साथी।।
काहें लगाईं हम मुँहे पर जाबा?
जातिवाद केतना, देवरिया में बाबा।।
बाप दादा बखाने, सुनावे जे० गारी।
ओहू की सामने, आ गईल लाचारी।।
भरोसा बा, बाबा पार करिहै नईया।
एही से साईकिल से भेजले ह भईया।
न काशी के चर्चा, न चर्चा में काबा।
जातिवाद केतना, देवरिया में बाबा।।
सूबा में खिलल, जवन फूल बाटे।
अंत समय में उहो, बाबे के छांटें।।
“लोहा से लोहा” में बबै के भेजें।
बबै लोग चौतरफा, वोटर सहेजे।।
“देहाती जी”कहें, गजब चाभी-चाभा।
जातिवाद केतना, देवरिया में बाबा।।