पंचायती राज: महिलाओं के हक पर परिजनों का डाका

देवरिया। भारतीय लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की व्यवस्था का मूल आधार पंचायती राज व्यवस्था ही है। पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं की 33 फीसद भागीदारी सुनिश्चित की गयी है। आलम यह है कि तीन फीसद महिलाएं भी अपनी कुर्सी पर स्वतंत्र रूप से बैठकर अपने फैसले नहीं ले सकतीं। कारण कि महिलाओं के हक पर उनके परिजनों ने डाका डाल रखा है। ये परिजन पति, पुत्र, देवर, भतीजा, ससुर, पुत्र आदि तमाम रूपों में हैं।
सभ्य समाज की स्थापना के बाद भी मानव धन और पद प्रतिष्ठा के लिए कितना गिर सकता है यह पंचायती राज व्यवस्था में देखने को मिल रहा है। सरकारें कोईं हों इस गैरकानूनी कार्य पर किसी सरकार ने कड़ाई नहीं की। महिलाएं केवल नाम की प्रधान, प्रमुख, चेयरमैन, जिलापंचायत अध्यक्ष बनी रहीं। वास्तविक सत्ता सुख उनके परिजनों ने भोगा। यहाँ तक कि उनके हस्ताक्षर से बैंकों से धन निकासी भी परिजनों ने की। मतलब क्या रहा गया इस महिला आरक्षण का? हम चुनौती पूर्वक कह सकते हैं कि यदि यही महिलाएं जनता द्वारा चुनकर लोकसभा या विधान सभा में जायेंगीं तो क्या उनके परिजनों का सदन में प्रवेश हो पायेगा? जो उनकी जगह बैठकर नीतिगत फैसले लें। जाहिर है आप का जवाब होगा नहीं। फिर निचले स्तर पर यह सुचिता क्यों नहीं कायम की जा रही। महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत में एक सशक्त पंचायती राज व्यवस्था का सपना देखा था, जिसमें शासन के कार्य की प्रथम इकाई पंचायते ही होगीं। गांधी जी की कल्पना पंचायतों की शासन व्यवस्था की केन्द्र होने के साथ ही आत्मनिर्भर, पूर्णतया, स्वायत्त एवं स्वावलंबी होने की थी। भारत स्वतंत्र होने से लेकर आज तक पंचायत की कल्पना को साकार करने का प्रयास निरन्तर चलता रहा है। कभी ग्रामीण विकास के नाम पर जो कभी सामुदायिक विकास योजना के माध्यम से पंचायत को लोकतंत्र का मूल आधार मजबूत बनाने के लिए किया जाता रहा है, जिससे पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना एवं आम जनता के हाथ में सीधे अधिकार देने का आरभ भारतीय संविधान के माध्यम से संभव हो पाया है। संविधान में वर्णित पंचायती राज व्यवस्था ने सभी को सामाजिक समानता, न्याय, आर्थिक विकास एवं व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर आधारित ग्रामीण जीवन को नया रूप देने का एक सामूहिक प्रयास है। पी. वी नरसिंहाराव सरकार ने राजीव गांधी सरकार द्वारा तैयार पंचायती राज संस्थाओं से संबधित विधेयक को संशोधित कर दिसंबर 1992 में 73 वां संविधान संशोधन के रूप में संसद से पारित करवाया। यह 73वां संविधान संशोधन 24 अप्रैल 1993 से लागू किया गया। इस संशोधन द्वारा संविधान में एक नया भाग अध्याय 9 जोड़ा गया है। अध्याय 9 द्वारा संविधान में 16 अनुच्छेद और एक ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गयी है। जिसका शीर्षक ‘पंचायत’ है। 73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 में पंचायती राज व्यवस्था को न केवल नई दिशा प्रदान की बल्कि यह महिलाओं की पंचायतों में 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान कर उनकी सहभागिता ब़ने का अवसर प्रदान किया । आप स्वतः अपने आसपास देख सकते हैं कि महिलाओं की कितनी भागीदारी है। यदि उन्हें सत्ता में भागीदारी और खुद फैसले लेने में कोई बाधक है तो वे हैं उनके परिजन। ऐसे परिजन जिनकी नैतिकता समाप्त हो चुकी है। महिला की आरक्षित कुर्सी पर बैठ कर भ्रष्टतम व्यक्ति कार्य सम्पादित कर रहे। आख़िरकार कोई ऐसी भी सरकार आएगी जो महिलाओं को उनका वास्तविक हक दिला पाएगी।
-रिपोर्ट
पुरूषोत्तम सिंह

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