राम भक्त स्वामी प्रसाद मौर्य पीटे क्यों जा रहे हैं?

  • हास्य-व्यंग्य / एम के पाण्डेय ‘निल्को’

देश में आजकल सबसे कठिन काम है — बिना चोट खाए अपनी बात कह देना। खासकर अगर बात आस्था, राजनीति और भीड़— इन तीनों के चौराहे पर आकर रुक जाए। हाल ही में “राम भक्त” स्वामी प्रसाद मौर्य जी के साथ जो हुआ, उसने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है — आखिर भक्त ही भक्त को क्यों पीट रहे हैं? इस सवाल के कई “जन-जनित” उत्तर मिल रहे हैं। पहला उत्तर तो यह है कि मौर्य जी का “राम भक्त” होना जनता ने अभी तक वेरिफाई नहीं किया था। भक्ति में भी अब KYC ज़रूरी हो गई है, और भीड़ के पास शायद E-KYC का समय नहीं था, तो उन्होंने सीधा “फिजिकल वेरिफिकेशन” शुरू कर दिया।

दूसरा कारण यह बताया जा रहा है कि उन्होंने मंच पर राम का नाम लिया, लेकिन “जय श्रीराम” के बाद “जय सियावर राम” नहीं बोला। भक्ति जगत में यह उतना ही बड़ा अपराध है जितना क्रिकेट में नो-बॉल पर विकेट गिरा देना। भीड़ का कहना है कि हम तो बस “नियम पालन” करवा रहे थे। तीसरी व्याख्या थोड़ी राजनीतिक है। हो सकता है भीड़ को यह लग गया हो कि प्रवचन के बहाने मौर्य जी चुनावी भाषण दे रहे हैं। भक्तजन यह तय नहीं कर पाए कि वे धार्मिक सभा में हैं या चुनावी रैली में, तो उन्होंने यह “भ्रम” लात-घूंसों से दूर करने की कोशिश की। चौथा कारण सबसे मज़ेदार है — भक्तों को लगा कि “राम भक्त” शब्द का पेटेंट उन्हीं के पास है। अब अगर कोई दूसरा इस शब्द का इस्तेमाल कर ले, तो रॉयल्टी वसूली जाएगी। बस, यह रॉयल्टी वसूली कर दी गई।

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कुल मिलाकर, यह घटना साबित करती है कि भक्ति पथ सरल नहीं है। यह तो सीधा “एडवेंचर स्पोर्ट्स” है, जिसमें जरा-सी चूक पर आप दर्शकदीर्घा से सीधे अखाड़े में धकेल दिए जाते हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य जी का यह अनुभव आने वाले समय में राजनीतिक विज्ञान और भीड़-व्यवहार के शोधकर्ताओं के लिए केस स्टडी बन सकता है।

डिस्क्लेमर:
यह लेख मात्र हास्य-व्यंग्य है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, समुदाय या आस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। इसमें वर्णित प्रसंग, संवाद और परिस्थितियाँ काल्पनिक या अतिरंजित रूप में प्रस्तुत की गई हैं। पाठक इसे मनोरंजन की दृष्टि से ही लें।

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