मुंबई ट्रेन धमाके: न्याय व्यवस्था की रीढ़ पर गहरे सवाल

रिपोर्टर: अभिजीत श्रीवास्तव

26 जुलाई 2025, मुंबई: 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के 19 साल बाद बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा सभी 12 दोषियों को बरी किया जाना न केवल एक कानूनी फैसला है, बल्कि यह भारत की न्याय प्रणाली, जांच एजेंसियों और अभियोजन व्यवस्था पर गहरा अविश्वास भी दर्शाता है। 187 लोगों की जान लेने और 800 से अधिक को घायल करने वाले इस भयावह हमले के लिए 2015 में विशेष मकोका अदालत द्वारा पांच को फांसी और सात को उम्रकैद की सज़ा दी गई थी, लेकिन हाई कोर्ट ने अभियोजन की गंभीर विफलताओं को उजागर करते हुए फैसला पलट दिया। गवाहों की अनदेखी, आरोपियों की पहचान न कराना, शिनाख्त परेड में देरी, और महत्वपूर्ण सबूतों की अनदेखी जैसी लापरवाहियों ने न्याय को तार-तार कर दिया। इस निर्णय ने न केवल पीड़ित परिवारों के घावों को फिर से हरा कर दिया है, बल्कि पूरे देश में यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि अगर इतने बड़े हमले के बाद भी किसी को दोषी साबित नहीं किया जा सका, तो क्या सच में उन 187 लोगों को किसी ने मारा ही नहीं? भारत में ऐसे कई आतंकी मामलों में न्यायिक विफलता की कड़वी मिसालें पहले भी देखी गई हैं — 1993 मुंबई बम धमाके, 2011 दिल्ली हाई कोर्ट धमाका, या 2022 अहमदाबाद ब्लास्ट — जिनमें अभियोजन की कमजोरियाँ खुलकर सामने आई हैं। यह केवल कानूनी प्रक्रिया की खामी नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आत्मचिंतन का विषय है। आतंकवाद के खिलाफ सख्त अंतरराष्ट्रीय रुख की मांग करने वाले देश के भीतर यदि ऐसे गंभीर मामलों में न्याय नहीं हो पा रहा है, तो यह लोकतंत्र और कानून व्यवस्था दोनों के लिए खतरे की घंटी है। देश को अब यह तय करना होगा कि क्या सिर्फ आर्थिक विकास ही उसकी प्राथमिकता है, या वह ऐसी न्यायिक और जांच व्यवस्था भी चाहता है जो अपने नागरिकों को न्याय दिला सके, अपराधियों को सज़ा दे सके और आतंकी ताकतों को यह संदेश दे सके कि भारत में अपराध कर बच निकलना संभव नहीं है।

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